SAMADHAN NEWS

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Friday, August 15, 2014

भारत की स्वतंत्रता के सड़सठ साल : “देशहित में आखिर हुआ क्या ? ” :-



तीन दिनों बाद भारत को स्वतंत्र हुए भी सड़सठ साल हो जाएँगे और भारतीय संसद तो साठ साल से ऊपर की हो ही चुकी है। भारतीय संसद पर जिस तरह अब तक लिखा गया है , दिखाया गया है और जिस तरह उसे महिमामंडित किया गया है , विशेषकर राजनीतिक तबके की ठकुर-सुहाती करने वाले स्वयंभु-पंडितों के द्वारा , उसे देख कर मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी का कहा हुआ याद आता है कि ‘इस देश के बुद्धिजीवी सब शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं।’ राजनीति के जानकार एवं मीडिया के धुरंधर शेर भी सियार रूपी सांसदों की हुआँ – हुआँ में सुर तो मिलाते हैं पर समीक्षा का दायित्व भूल जाते हैं कि संसद ने अपने साठ साल से ऊपर के जीवनकाल में आखिर किया क्या ? अनैतिकता, झूठ, भ्रष्टाचार, तिकड़म, महंगाई और गप्पबाजी के अलावा इन छह दशकों के ऊपर के कार्यकाल में संसद का कोई अतिरिक्त सार्थक उत्पाद हो तो कोई बताए ? क्या आपको यह नहीं लगता कि आजादी के बाद से ही संसद में विराजमान होने वाले महानुभावों ने पूरे देश को और देश की सम्पूर्ण नागरिकता को इस तरह घेरे में जकड़ दिया है कि हर नागरिक खुद को सवालों के सामने खड़ा पाता है और उस मुहावरे का सार समझने की जद्दोजहद करता है, जो आजादी और गांधी के नाम पर पिछले सड़सठ सालों से चल रहा है, जिससे न भूख मिट रही है, न महंगाई की निर्बाध गति पर कोई रुकावट है, न संसदवालों का भ्रष्टाचार थम रहा है और न व्यवस्था ही बदल रही है।
हरेक वर्ष आजादी के जलसे के आयोजनों का पूरा केंद्रीकरण देश की प्रतिष्ठा और लोकतन्त्र के औचित्य के खतरे में पड़ते जाने की चिंता व्यक्त करते हुए होता है l भ्रष्ट जन-प्रतिनिधियों की चिंता नागरिकों के जागरूक होने से गहराती है, यह स्वाभाविक है, लेकिन इस चिंता से भ्रष्टाचार जाता हुआ नहीं दिख रहा बल्कि गिरोहबंदी गहराती ही दिख रही है। आपने देखा होगा कि अन्य दिनों में देश की अस्मिता को दांव पर रखने वाला जनप्रतिनिधि भी इस अवसर पर देशहित की बातें करता है , आजादी के नग्मे दुहराता है , तिरंगे की शपथ लेता है l यह अनुशासन उसका गिरोहबंद अनुशासन है , एक छदयम -जाल बुनने की कोशिश । राजनीतिक तबके ने भ्रष्टाचार, चोरी-बटमारी, महंगाई-अराजकता और चारित्रिक घटियापन के सड़सठ सालाना उत्पाद पर कभी गंभीर चिंता नहीं जताई है । आजादी के बाद से आज तक किसी भी जनप्रतिनिधि में यह आत्मनिर्णय भी नहीं जागा कि वो सदन में खड़ा होकर यह कहता कि आज से वह भ्रष्टाचार में शामिल नहीं होगा, सदन के सत्र को अनावश्यक रूप से बाधित कर देश के धन के अपव्यय का हिस्सेदार नहीं बनेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और हम सबने अपने जन-प्रतिनिधियों के अब तक के रवैये से यही महसूस किया कि … ” भूख विकास के मुद्दे ठंढे बस्ते में / घोटालों की ताप हमारी संसद में / किसने लूटा देश ये सारा जग जाने/ मिलते नहीं सबूत हमारी संसद में…”
स्पष्ट है कि आजादी के बाद से ही देश के राजनीतिज्ञों ने जनता और जरायम पेशागरों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वस्तिक चिन्ह बना लिया है और हवा में एक चमकदार शब्द फेंक दिया है ‘जनतंत्र’, और हर बार यह शब्द राजनीतिज्ञों की जुबान पर जिंदा पाया जाता है। सड़सठ साल की आजादी कितनी भयावह है , साठ साल से ऊपर की संसद कितनी कुरूप है उसे हम सब ने अपने अनुभवों से जाना है, देखा है और भोगा है। हम ही वह जनतंत्र हैं जिस में जनता का सिर्फ नाम भुनाया गया और संसद इसकी गवाह बनती रही। ये सांसद सब के सब भ्रष्टाचार के आविष्कारक हैं, अण्वेषक हैं, इंटरप्रेटर हैं, वकील हैं, वैज्ञानिक हैं, अध्यापक हैं, दार्शनिक हैं, या हैं किंकर्तव्यविमूढ़ चश्मदीद… !!मतलब साफ है कि कानून और संविधान की भाषा बोलता हुआ यह अपने व्यक्तिगत हितों को सर्वोपरि मानने वाला एक संयुक्त परिवार है।
किसी ने ठीक ही कहा है ” जब जनदूत हमारा संसद जाकर धारा में बह जाता हो और जब चोरी और दुर्नीति की वो आग लगाने लगता हो, तब पूरी संसदीय व्यवस्था को फ़ूँक ताप लेने का मन करता है… शासन-तंत्र-बल के घेरे में नेता कोई जब स्वतन्त्रता व जनतंत्र जाप करने लगता हो, तब- तब संसद में आग लगाने का अपना मन करता है। “

Sunday, March 23, 2014

पत्रकारो! अब देर मत करो...

कोई अखबार छोटा नहीं होता। कोई पत्रकार बड़ा नहीं होता। अगर वह वाकई अखबार है तो। और अगर वह वाकई पत्रकार है तो। कुछ पत्रकारों की अतिरिक्त आर्थिक सम्पन्नता और कुछ पत्रकारों की अतिरिक्त आर्थिक विपन्नता का विचित्र-विरोधाभास पत्रकारीय-धर्म पर वेदना की तरह चस्पा है। अभी चुनाव का समय है। 'पेड न्यूज़' की फिर चर्चा शुरू हुई और पत्रकारों की निन्दा का प्रस्ताव फिर से जारी होना शुरू हो गया। यह 'पेड न्यूज़' किन पत्रकारों को और किन मालिकों को फायदा पहुंचाता है, इसके बारे में आप सब अच्छी तरह जानते हैं। छोटे कस्बों, तहसील, ब्लॉकों से लेकर जिलों और राज्य मुख्यालय तक के संघर्षशील ईमानदार पत्रकार खुद अपनी ताकत के प्रति कब सतर्क होंगे..? हमलोग संवाद बनाएं और पहल करें... पर भेजें, ताकि हम सब मिल कर शक्ति का शामियाना खड़ा कर सकें... जिनकी चुटकी में चिंगारी निकालने की ताकत हो या चिंगारी पैदा करने की ताकत लाने की जिजिविषा हो, वे साथी ही दोस्ती का हाथ बढ़ाएं...
पत्रकारो! अब देर मत करो...

पत्रकारों की तो बहुत बुरी दशा है। अब चुनाव आ रहा है तो और बुरी दशा होने वाली है। जबकि समाज में ठीक इसके उलटी कथा चलती है। चुनाव आ रहा है अब तो पत्रकारों की मौज ही मौज है। जबकि यह घोर विपरीत तथ्य है। चुनाव आ रहा है तो पत्रकारों की बहुत बुरी दशा होने वाली है और मीडिया मालिकों की मौज ही मौज। यह कोई लिखेगा-बोलेगा नहीं। जो मुंडी पर पेट्रोल का पीपा उठाए चलते हों वही चुटकियों से चिंगारी चटखाने की हिम्मत करें तो बात बनती है। वरना वाक-रति का तो भारत में कम्पीटिशन ही कम्पीटिशन है। जितने खोखले लोग उतनी ही भरी-भरी बातें। सीतापुर में एक सेमिनार में मुझे भी बुला लिया था पत्रकार भाइयों ने। साख का संकट सेमिनार का विषय था और इस फैशनेबुल विषय पर बोलने वाले निन्दा-फैशन के धनी लोगों ने पत्रकारों को गरियाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। जो आए, वही गरियाए। दारू-मुर्गा खा कर खबर लिखते हैं। खबरें बेचते हैं। पत्रकार और दारोगा में कोई फर्क नहीं रहा। बिक चुके हैं। मर चुके हैं। वगैरह वगैरह। जो लोग निन्दा रस का गायन सुर और ताल का ध्यान रखे बगैर चला रहे थे, उन सब की चारित्रिक पृष्ठभूमि का तो नहीं पता और पृष्ठभूमि का पता चलना भी नहीं चाहिए जब अग्रभूमि ही सामने दिख रही हो तो। क्योंकि शब्दों की मर्यादा का आचरण तो मंच पर प्रदर्शित हो ही रहा था। बहरहाल, इतना गायन सुनने के बाद यह आत्मज्ञान हुआ कि इस सेमिनार में मैं तो गलत आ गया। मंच के सामने करीब-करीब सारे नहीं तो बहुसंख्यक पत्रकार और उन्हें गरियाने वाले मंच पर महिमामंडित भी और गालियां सुन-सुनकर तालियां भी। बड़ा अचंभित करने वाला 'कॉम्बिनेशन' बन रहा था। गालियां सुनते-सुनते उसी बीच अचानक मेरा नाम भी गूंजा। लगा कि गरियाने के क्रम में चलो अच्छा हुआ कि मेरा भी नाम सार्वजनिक रूप से पुकारा गया। लेकिन फिर झटका लगा कि वह तो मुझे बोलने के लिए आमंत्रित किया जा रहा था और इसीलिए मेरा नाम अनाउंस किया जा रहा था। खैर, मैंने अपनी भ्रांति दूर की कि मैं विचार सभा में नहीं बल्कि भर्त्सनासभा में आया था और मुझे ऐसी सभा में आने का अफसोस है। बहुत ही हार्दिक तकलीफ पत्रकारों की दशा देख कर हुई कि गालियां भी सुन रहा है और तालियां भी बजा रहा है। गालियां सुनने के बावजूद तालियां बजाने की जीवन-शर्त है पत्रकारिता का धंधा। मंच पर अच्छी संख्या में नेता भी बैठे थे। सांसद-विधायक भी थे और कुछ पूर्व थे तो कुछ वर्तमान और कुछ भविष्य के नेता भी थे। ये सारे नेता अखबार का इस्तेमाल कर ही नेता बने और अपनी स्थितियां मजबूत कीं। यह सिलसिला जारी है। लेकिन विडम्बना देखिए कि जिस जमात के बूते कोई सड़कछाप आदमी नेता बना उसने फौरन ही अपनी साख देखे बगैर मीडिया की साख तौलनी शुरू कर दी। मैंने पत्रकारों से कहा कि नेताओं के बारे में छापना बंद न करें, क्योंकि यह समाचार संकलन के कर्म के साथ अन्याय होगा, लेकिन जिस भी किसी नेता के बारे में छापें या उनका साक्षात्कार छापें, आप उनका इंटरव्यू इस सवाल के साथ शुरू करें कि 'आपने पत्रकार को करप्ट करने के अलावा क्या उसे जीवन में आर्थिक तौर पर विधिक रूप से स्थापित करने और प्रतिष्ठित करने के लिए कभी भी संसद या विधानसभा या नगर पालिका या पार्टी फोरम में बात उठाई? अगर उठाई तो उसका विवरण दें।' इस पहले सवाल के साथ देशभर में किसी भी नेता का इंटरव्यू होने लगे तो यकीन मानिए साथियो कि नेता इंटरव्यू से भागने लगेगा। क्योंकि उसने पत्रकारों को भ्रष्ट करने के सिवा कुछ किया ही नहीं है। कुछ नेताओं ने पत्रकारों के 'वेज बोर्ड' को लेकर बात उठाई भी तो वह केवल मीडिया में नाम छपवाने की प्रक्रियाभर थी। कभी किसी ने यह फिक्र नहीं कि कौन सा वेज बोर्ड बना, पत्रकारों का क्या वेतन है, कौन संस्था वेतन देती है, कौन किश्तों में देती है, कौन नहीं देती है, क्यों नहीं देती है, नेता मीडिया मालिकों को पैसा खिला कर खबरें क्यों छपवाता है और पत्रकारों को क्यों बदनाम करता है, वगैरह वगैरह... नेताओं ने पत्रकारिता के पेशे को कानूनी तौर पर सम्मानित कराने की फिक्र की होती तो आज हमें कोई गरियाने की हिम्मत नहीं करता। इस प्रायोजित-निन्दा कार्यक्रम के खिलाफ हम उठें, बहुत ही सार्थक तरीके से उठें, बहुत ही कारगर तरीके से उठें, पहल तो करें...

Saturday, March 22, 2014

मदर टेरेसा की जीवनी : बचपन से सिस्टर टेरेसा तक

कहते हैं जिंदगी जिंदादिली का नाम है,मुर्दा दिल क्या खाक जीया करते हैं। हम आपसे बात करने जा रहे हैं जिंदादिली की। एक ऐसी महिला की जिंदादिली की जिसने जन्म के बाद होश संभालते ही दूसरों के लिए जीना शुरू कर दिया। जिसने अपनी जिंदगी का हर एक पल दूसरों के नाम कर दिया। 

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उन्होंने जो किया वह इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं फिर भी पूरी दुनिया में जिंदादिली के लिए उनकी मिसाल दी जाती हैं। समाज सेवा और मानव सेवा के क्षेत्र में उन्होंने जो किया वह शायद ही कोई कर पाए। जी हां हम बात कर कर रहे हैं मदर टेरेसा की। कहा जाता है कि दुनिया में हर कोई सिर्फ अपने लिए जीता है पर मदर टेरेसा जैसे लोग सिर्फ दूसरों के लिए जीते हैं। उनके जन्म दिवस पर हम आपको रूबरू करवाने जा रहे हैं उनकी जिंदगी के हर एक पन्ने से....
मदर टेरेसा की जीवनी : बचपन से सिस्टर टेरेसा तक 

करुणा और सेवा की साकार मूर्ति मदर टेरेसा मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को मेसिडोनिया की राजधानी स्कोप्जे शहर (Skopje,capital of the Republic of Macedonia)) में हुआ था। 

यूं तो उनका जन्म 26 अगस्त को हुआ था पर वह खुद अपना जन्मदिन 27 अगस्त को मानती थीं। उनके पिता का नाम निकोला बोयाजू और माता का नाम द्राना बोयाजू था। मदर टेरेसा का असली नाम‘एग्नेस गोंझा बोयाजिजू’(Agnes Gonxha Bojaxhiu )था। अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। जिसे मदर टेरेसा ने सच कर दिखाया। मदर टेरेसा एक ऐसी महकती कली थीं जिन्होंने गरीबों और असहायों की जिन्दगी में प्यार की खुशबू भरी।

एग्नेस के पिता बचपन में ही चल बसे। बाद में उनका लालन-पालन उनकी माता ने किया। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी मदर (गोंझा) टेरेसा एक सुन्दर जीवंत,अध्ययनशील एवं परिश्रमी लड़की थीं। 

पढ़ना,गीत गाना वह विशेष पसंद करती थीं। वह और उनकी बहन आच्च गिरजाघर में प्रार्थना की मुख्य गायिका थीं। बाद में गोंझा को एक नया नाम‘सिस्टर टेरेसा’दिया गया जो इस बात का संकेत था कि वह एक नया जीवन शुरू करने जा रही हैं। यह नया जीवन एक नए देश में जोकि उनके परिवार से काफी दूर था,सहज नहीं था लेकिन सिस्टर टेरेसा ने ऐसा किया वह भी बड़ी शांति के साथ। 

बाल्यकाल में ही मदर टेरेसा के हृदय में विराट करुणा का बीज अंकुरित हो उठा था। मात्र अठारह वर्ष की उम्र में दीक्षा लेकर वे सिस्टर टेरेसा बनी थीं। 

इस दौरान 1948 में उन्होंने वहां के बच्चों को पढ़ाने के लिए एक स्कूल खोला और बाद में‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। सच्ची लगन और मेहनत से किया गया काम कभी निष्फल नहीं होता,यह कहावत मदर टेरेसा के लिए सच साबित हुई। मदर टेरेसा (Mother Teresa)की मिशनरीज संस्था ने 1996 तक करीब 125 देशों में 755 निराश्रित गृह खोले जिससे करीबन पांच लाख लोगों की भूख मिटाई जाने लगी। 

1950 में कोलकाता में मिशनरीज़ ऑफ चेरिटी की स्थापना करने के बाद 45 सालों तक गरीब,असहाय,बीमार,अनाथ और मरते हुए लोंगों की मदद करने वाली मदर टेरेसा 1970 तर अपने इन मानवीय कार्यों के लिए प्रसिद्ध हो गईं। 

मदर टेरेसा ने भ्रूण हत्या के विरोध में भी सारे विश्व में अपना रोष दर्शाते हुए अनाथ एवं अवैध संतानों को अपनाकर मातृत्व-सुख प्रदान किया है। उन्होंने फुटपाथों पर पड़े हुए रोते-सिसकते रोगी अथवा मरणासन्न असहाय व्यक्तियों को उठाया और अपने सेवा केन्द्रों में उनका उपचार कर स्वस्थ बनाया,या कम से कम उनके अंतिम समय को शां‍तिपूर्ण बना दिया। दुखी मानवता की सेवा ही उनके जीवन का व्रत है

उनका कामयाबी अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके निधन तक उनकी संस्था(मिशनरीज ऑफ चैरिटी)123 देशों में 690 मिशन नियंत्रित कर रही थी। इसमें एचआईवी/एड्स,कुष्ठ और तपेदिक के रोगियों के लिए धर्मशालाएं/घर शामिल थे,और साथ ही सूप रसोई,बच्चों और परिवार के लिए परामर्श कार्यक्रम,अनाथालय और विद्यालय भी थे। 

सिस्टर टेरेसा तीन अन्य सिस्टरों के साथ आयरलैंड से एक जहाज में बैठकर 6 जनवरी, 1929 को कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट’ पंहुचीं। वह बहुत ही अच्छी अनुशासित शिक्षिका थीं और विद्यार्थी उन्हें बहुत प्यार करते थे। वर्ष 1944 में वह सेंट मैरी स्कूल की प्रिंसिपल बन गईं। 

धीरे-धीरे उन्होंने यहां बेसहारा और विकलांग बच्चों तथा सड़क के किनारे पड़े असहाय रोगियों की दयनीय स्थिति को अपनी आंखों से देखा और फिर वे भारत से मुंह मोड़ने का साहस नहीं कर सकीं। वे यहीं पर रुक गईं और जनसेवा का व्रत ले लिया,जिसका वे अनवरत पालन करती रही। 

सन् 1949 में मदर टेरेसा ने गरीब, असहाय व अस्वस्थ लोगों की मदद के लिए ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की,जिसे 7 अक्टूबर, 1950 को रोमन कैथोलिक चर्च ने मान्यता दी. इसी के साथ ही उन्होंने पारंपरिक वस्त्रों को त्यागकर नीली किनारी वाली साड़ी पहनने का फैसला किया। मदर टेरेसा ने ‘निर्मल हृदय’और ‘निर्मला शिशु भवन’के नाम से आश्रम खोले,जिनमें वे असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों की स्वयं सेवा करती थीं।

मदर टेरेसा को मिले पुरस्कार- 

साल 1962 में भारत सरकार ने उनकी समाज सेवा और जन कल्याण की भावना की कद्र करते हुए उन्हें 'पद्मश्री' से नवाजा। 1980 में मदर टेरेसा को उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए भारत सरकार ने 'भारत रत्‍न' से अलंकृत किया। विश्व भर में फैले उनके मिशनरी के कार्यों की वजह से मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला।

उन्हें यह पुरस्कार गरीबों और असहायों की सहायता करने के लिए दिया गया था। उन्होंने नोबेल पुरस्कार की 192,000 डॉलर की धन-राशि को भारतीय गरीबों के लिए एक फंड के तौर पर इस्तेमाल करने का निर्णय लिया यह उनके विशाल हृदय को दर्शाता है।


एक पत्रिका के संपादक बनने के लिए

कैरोलिन Barratt, राधिका, जेना, रजत मुकुट और 8 अन्य लोगों द्वारा संपादित
एक पत्रिका लेखक के कैरियर के शिखर पर एक पत्रिका के संपादक बन गया है. पत्रिका के संपादकों कंपनी के कर्मचारियों या फ्रीलांसरों के लेखन सामग्री की निगरानी. संपादकों लेखक का दृश्य, सामग्री, शैली और टोन पाठकों और ग्राहकों की पत्रिका बाजार का फोकस से मेल खाता सुनिश्चित करते हैं.

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टिप्स

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  • एक लेखक के सम्मेलन में भाग लेने.
  • स्कूल रोजगार प्लेसमेंट सर्विस के साथ एक इंटर्नशिप या रोजगार की जांच के लिए लग रही है.नियुक्ति सेवा आम तौर पर स्वतंत्र है.
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चेतावनी

  • पुरानी कहावत याद रखें "यह भी सच्चा होना अच्छा लगता है, यह शायद है."
  • स्कूल विज्ञापनों और रोजगार के प्रस्ताव से घोटाले से सावधान रहना.
  • रोजगार सेवाओं को अपनी ओर से रोजगार प्राप्त करने के लिए एक शुल्क के लिए पूछ के साथ व्यवहार करते समय सतर्क रहें.

Society, charitable societies, Trust, foundation - Indian NGO.

Society, charitable societies, Trust, foundation - Indian NGO.

Societies are similar in character to trusts, although there are a few essential differences. Minimum of seven individuals are required to form a society.

Societies are membership organizations that may be registered for charitable purposes. A governing council or a managing committee usually manages societies. Societies are governed by the Societies Registration Act 1860, which has been adapted by various states. Unlike trusts, societies may be dissolved.
The Societies Registration Act governs societies, 1860, which is an all-India Act. Many states, however, have variants on the Act. Societies are similar in character to trusts, although there are a few essential differences. While only two individuals are required to form a trust, minimums of seven individuals are required to form a society. The applicants must register the society with the state Registrar of Societies having jurisdiction in order to be eligible to apply for tax-exempt status. A registration application includes the society's memorandum of association and rules and regulations. In general, Indian citizens serve as members of the managing committee or governing council of societies, although there is no prohibition in the Societies Registration Act against non-natural legal persons or foreigners serving in this capacity.
According to section 20 of the Act, the types of societies that may be registered under the Act include, but are not limited to, the following:

Charitable societies;

Societies established for the promotion of science, literature, education, or the fine arts; and Public art museums and galleries, and certain other types of museums. The governance of societies also differs from that of trusts; a governing council usually manages societies or managing committee, whereas their trustees govern trusts.
Individuals or institutions or both may be members of a society. The general body of members delegates the management of day-to-day affairs to the managing committee, which is usually elected by the membership. Members of the general body of the society have voting rights and can demand the submission of accounts and the annual report of the society for inspection. Members of the managing committee may hold office for such period of time as may be specified under the bylaws of the society.
Society, unlike trust, must annually file a list of the names, addresses and occupations of their managing committee members with the Registrar of Societies. Furthermore, in a society all property is held in the name of the society, whereas all of the property of a trust legally vests in the trustees.
Unlike trusts, societies may be dissolved. Dissolution must be approved by at least three-fifths of the society's members. Upon dissolution, and after settlement of all debts and liabilities, the funds and property of the society may not be distributed among the members of the society. Rather, the remaining funds and property must be given or transferred to some other society, preferably one with similar objects as the dissolved entity.
Societies are membership organizations that may be registered for charitable purposes. A governing council or a managing committee usually manages societies. Societies are governed by the Societies Registration Act 1860, which has been adapted by various states. Unlike trusts, societies may be dissolved. The Societies Registration Act governs societies, 1860, which is an all-India Act. Many states, however, have variants on the Act.

Apply for 80g - FORM 10G of NGO for Tax Exemption to Donors.

Apply for 80g - FORM 10G of NGO for Tax Exemption to Donors.

How to apply for 80g certification? Nonprofit ngo shall fill FORM 10G of Income tax department for approval of 80g to provide tax exemption to the donors.

When the nonprofit NGO organizations have registered with income tax department by getting 12A certificate, it shall start to get 80g certificate.
The main role of 80g certification is to encourage the donors who donate funds to the nonprofit NGO organization. That is organization hold this 80g certificate to provide tax exemption to the donors who donate their funds and they will get 10% tax exemption on their Gross total income of an accounting year.
Here people are thinking that they will get 50% of tax exemption before the calculation of their taxable Annual Income. But its is not in such a way. 50% of amount is calculated in the amount what they have donated to the nonprofit NGO organization. And in that 50% of that donated amount, the donor shall get 10% of maximum tax exemption as per Gross total income of the Donor.
To know how the donations of the donors are exempted under section 80g you shall visit this page.
Now let us see, How to apply for 80g ?. What are the steps to be taken by nonprofit NGO organizations to get this 80g certificate from Income tax department.
To get the 80g certificate nonprofit NGO organization have to fill the FORM 10G and they have to attach the activity report for the past 3 years or the least year with the audited report right from the date of establishment or of the past 3 years. You can download the editable FORM 10G to get registered for 80g approval from income tax department. This process may take several months, to receive the approvals.

When you apply for 80g you shall check yourself for the fitness of 80g approval under the following factors.

1. If nonprofit NGO organization is under going with any business, then they have to maintain a separate account and should not mix the donations they receive for social cause.
2. Other than charitable cause the organization or its byelaw should not represent any other causes towards spending of such donation amounts or the assets and incomes of the nonprofit NGO organization.
3. The nonprofit NGO organization shall not be able to apply for 80g if it support religion based, caste and creeds based activity.
4. The nonprofit NGO organization should have the qualification of registration which might have been registered under Societies registration act 1860 or registered under section 25 of Companies act 1956.
5. Proper annual returns, accounting, book keeping should be in manner before applying for 80g.
6. If you have already received the 80g certificate, then proper renewal is must to hold such tax benefits.
Income tax department has the power to approve or reject such approval upon disqualification of the nonprofit organization or dissatisfaction found by the department towards the nonprofit NGO organization activities.

how to apply for 12a, 80g, 35ac,

how to apply for 12a, 80g, 35ac, and steps to applying for FCRA ? We are not going to explain the laws. But we have given a basic knowledge tips as nonprofits and ngo are searching the word "how to apply for".
Several social welfare nonprofit organizations are not aware of getting the certification from income tax department or from the foreign affairs department for their fundraising, due to the lack of knowledge or as they do not know the exact way to get it. When they are in neck of the movement or when they are in an issue related to such certificate, they are driving the search engines to know it.
In case of some other nonprofit ngo organization, they are not going to Auditors, as they are feared of such officials by lack of knowledge and preparation to furnish the information to such Auditors and other officials, by presuming, what they are going to ask for, or not having the capability to pay the auditors for their processing fees and related matters by presuming that they will be in position to pay higher value of money as fees.
But if such nonprofit ngo organization get the below ideas, then they will automatically move with the Auditors which may help the organization to get the proper eligibility and certification. In fact, some certification shall be obtained by the organization by itself even without disturbing the Auditors, if they are very well qualified with efficiency and skill.
In our experience and in our survey we came to know that without knowing the below basic knowledge, several ngo organizations went in mal practice and they got punished and black listed by the Indian Government and Social welfare ministry.
Here in our nonprofit ngo .com we are not going to explain the laws. But we have given a basic knowledge tips to get such certification, as people are always searching with the word HOW TO APPLY FOR. Before applying any tax exemption related certifications you must have a PAN Card (Permanent Account Number with Income Tax department - Apply for PAN) . Without PAN you cannot apply for 12a.

Applying for 12a certification

To ensure the acceptance of the organization by Income Tax department we need to apply for 12a certification. After getting the 12a certification the organization gets the perfect legal entity. After received the 12a certification, organization shall,apply for 80G

Apply for 80G certification

By showing their record of achievements in social welfare activities and by proving their service to the public. By getting this 80 G certification, organization are privileged to provide tax exemption to the Donors who donates their organization. That is when an organization receives donation from public, individual or from a group it shall issue 80G tax exemption to the donor, where donors are entitled to donate from their 10% of Gross total annual income. In that 10% of their donation, donors shall receive 10% tax exemption for their donation. So this type of certification, gives the power to the organization to encourage their donation to donate more.

Applying for 35AC.

35AC tax exemption eligibility is provided by the income tax department to the organization to raise the funds for specific projects such as medical research, and so many other social welfare activities. By this 35ac certificate, the organizations are privileged to provide 100% tax exemption to the amount received as donation from the donors. So when the donor donates a fund for the project, they shall receive full tax exemption. 35ac sector has several other sub division certifications like 35ac 1 & 2, 35ac 1 & 3, which has same and additional privilege to provide tax exemption to the donors. (See the details about 35ac) In fact the entire nonprofit ngo organization are not being qualified or certified for 35ac. In a broad vision it is provided for specific projects and being monitored by Income tax department for proper accountability and service of such projects which have to be completed within some specific periods.
So the above information are about tax exemption certificates which give the power to the nonprofit organizations, to provide tax exemption benefits to the donors and contribution providers. In another vision, if an organization is receiving funds or donation from another organization for a same project or with same object, it may come into an account of inter charity donation. So there, these types of tax exemptions shall not be valid.
Note: All tax exemption procedures, certifications and information related to above certificates are only for outline knowledge and as a visitor you have to consult with professional auditors, lawyers, and other qualified persons who deal with income tax accounting for nonprofit organizations.

Then about applying for FCRA: (Foreign Contribution Regulation Act)

In all countries, all governments have their own rules and regulation towards foreign contribution to their native country. It may be in currency form or it may be in material form. However, it's our duty and our responsibility to inform our government before our foreign deals. In this vision every nonprofit organization has the responsibility to inform about their contribution in any form, which they are going to receive from outside their native country. Our Indian government has specified several procedures and rules to received foreign funds or materials from outside sources of India. And the Home ministry and External affairs ministry plays and empowered to monitor and to administrate such foreign deals. So here the Foreign Contribution Regulation Act of India applies.
An authorization certificate is being issued by the home ministry of India which is called FCRA to the nonprofit ngo organization before their play with any type of foreign contribution. So apply for FCRA, nonprofit ngo organization have to apply by opening a separate bank account where they should not transact any of their local funds. A separate book keeping, accounting procedures should be followed as per the Foreign contribution regulation Act.
It will be better, if the nonprofit ngo organization is applying specifically for a cause or project, to get the prior permission. NGO sector people use to say, that there are some special routes to receive foreign currency, even without prior permission and it shall be informed to the Government within 30 days on receipt of such foreign contribution, which is not a healthy approach and it may lead the nonprofit organization to several enquiries which may result as punishable offence. So our suggestion is, without the knowledge and prior permission of Indian Government any citizen, or nonprofit ngo organization, should not receive or deal with any foreign currency or any type of foreign contribution.

Monday, February 10, 2014

ढोल गँवार शूद्र पशु नारी | सकल ताड़ना के अधिकारी ||

प्रिय दोस्तों, मैं आज आपको तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस की कुछ ऐसी चौपाइयो की गहराई से अवगत करना चाहता हूँ, जिसका समाज में ग़लत इस्तेमाल किया जा रहा है.
समाज के कुछ लोग "नारी" की छवि को धूमिल करने के लिए रामचरितमानस की कुछ ऐसी चौपाइयो का प्रयोग करतें हैं, जिसकी सच्चाई जाने बिना "नारी" के बारे में उनका उपयोग अपनी मूर्खता दिखना ही कहलाया जाएगा. 

सबसे पहले बात आती है. सुंदरकांड की चौपाई की जो 58वें दोहे के बाद आती है.

ढोल गँवार शूद्र पशु नारी | सकल ताड़ना के अधिकारी ||

कुछ लोग इस चौपाई का इस्तेमाल रामचरितमानस और तुलसीदास जी पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए करते हैं. कुछ महिलाएँ भी लगभग यही सोचती हैं की तुलसीदास जी ने इस चौपाई को क्यों लिखा. 
तो जानिए इस चौपाई की सच्चाई.

ये चौपाई सुंदरकांड में उस समय आती है जब "राम जी" का "समुद्र" के साथ संवाद चल रहा था. 
उस समय जड़ "समुद्र" भगवान राम जी के सामने भयभीत होकर कहता है.

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे | छ्महु नाथ सब अवगुण मेरे.
गगन समीर अनल जल धरणी | इन्ह की नाथ सहज जड़ करनी.
तव प्रेरित माया उपजाए | सृष्टि हेतु सब ग्रंथनी गाए.
प्रभु आयसु जेहि कहं जस अहई | सो तेहि भाँति रहें सुख लहई ||
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दिन्ही | मरजादा पुनि तुम्हरी किन्ही ||
ढोल गँवार सूद्र पसु नारी | सकल ताड़ना के अधिकारी ||
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई | उतरीहि कटकु न मोरि बड़ाई ||
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई | अरौं सो बेगी जो तुम्हहि सोहाइ ||

यहाँ पर ये बात साफ तौर पर पता चलती है की ये बात तुलसीदास ने लिखी ज़रूर लेकिन ये संवाद थे जो "समुद्र" और "राम जी" के बीच था, ऐसी मानसिकता समुद्र की थी. तुलसीदास जी की नही.
यहाँ पर जो ढोल गँवार शूद्र पशु और नारी के लिए वचन कहे गये है. ये समुद्र की मानसिकता को प्रदर्शित करती है. इसी समुद्र के अहंकार के कारण भगवान राम को तीसरे दिन धनुष उठाना पड़ गया था.


इसके बाद बात आती है अरण्य कांड की एक चौपाई की जो 34वें श्लोक के बाद आती है.

अधम ते अधम अधम अति नारी | तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारी ||

कुछ लोग इस चौपाई का इस्तेमाल भी "भागवतदास जी" के उपर प्रश्न चिन्ह लगाने के लिए करतें है. तो आइए इस चौपाई की गहराई भी जाने.

ये चौपाई अरण्य कांड में उस समय आती है जब "शबरी" "राम जी" के सामने हाथ जोड़कर कहती है की...........

पानि जोरि आगें भई ठाढी | प्रभुही बिलोकी प्रीति अति बाढ़ि ||
केहि बिधि अस्तुति करूँ तुम्हारी | अधम जाती मैं जड़मति भारी ||
अधम ते अधम अधम अति नारी | तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारि ||
कह रघुपति सुनू भामिनी बाता | मानाउँ एक भागति कर नाता ||
ज़ाती पँति कुल धर्म बड़ाई | धन बल परिजन गुण चतुराई ||
भगति हीन नर सोहइ कैसा | बिनु जल बरिद देखिअ जैसा ||
नावधा भागती कहउँ तोहि पाहि | सावधान सुनू धरू मन माही ||

यहाँ पर भी ये बात "शबरी" द्वारा कही ज़ाती है. और ये कहते ही भगवान राम जी "शबरी" से कहते हैं. की हे - भामिनी. मेरी बात सुन. मैं तो केवल एक भक्ती ही का संबंध मानता हूँ.
ज़ाती, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता - इन सबके होनेपर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है. वैसे ही जैसे जलहिन बादल.

देखिए ये सभी बातें संवाद के अंदर लिखी गई हैं. इनको गहराई से जानना आवश्यक है.
तुलसीदास जी "नारी" के बारे में क्या कहते हैं वो देखिए.....बाल कांड के प्रारंभ में ही तुलसीदास जी सीता (नारी शक्ति) के बारे में कहते है.

उद्भवस्थितिसंहारकारिणी क्लेशहरिणीम् |
सर्वश्रेयस्कारीं सीता नतोऽहं रामवल्लभाम् ||
व्याख्या - उत्पत्ति, स्थिति(पालन) और संहार करनेवाली, क्लेशों की हरनेवाली तथा संपूर्ण कल्यानो को करनेवाली श्री रामचंद्रजी की प्रियतमा श्री सीताजीको मैं नमस्कार करता हूँ.

मानस के सिद्ध स्तोत्रों के अनुभूत प्रयोग

मानस के सिद्ध स्तोत्रों के अनुभूत प्रयोग

मानस के सिद्ध स्तोत्रों के अनुभूत प्रयोग
१॰ ऐश्वर्य प्राप्ति
‘माता सीता की स्तुति’ का नित्य श्रद्धा-विश्वासपूर्वक पाठ करें।
“उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।” (बालकाण्ड, श्लो॰ ५)”
अर्थः- उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाली, क्लेशों की हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों की करने वाली श्रीरामचन्द्र की प्रियतमा श्रीसीता को मैं नमस्कार करता हूँ।।
२॰ दुःख-नाश
‘भगवान् राम की स्तुति’ का नित्य पाठ करें।
“यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।” (बालकाण्ड, श्लो॰ ६)
अर्थः- सारा विश्व जिनकी माया के वश में है और ब्रह्मादि देवता एवं असुर भी जिनकी माया के वश-वर्ती हैं। यह सब सत्य जगत् जिनकी सत्ता से ही भासमान है, जैसे कि रस्सी में सर्प की प्रतीति होती है। भव-सागर के तरने की इच्छा करनेवालों के लिये जिनके चरण निश्चय ही एक-मात्र प्लव-रुप हैं, जो सम्पूर्ण कारणों से परे हैं, उन समर्थ, दुःख हरने वाले, श्रीराम है नाम जिनका, मैं उनकी वन्दना करता हूँ।
३॰ सर्व-रक्षा
‘भगवान् शिव की स्तुति’ का नित्य पाठ करें।
“यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके
भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट,
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा शर्वः
सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम ||” (अयोध्याकाण्ड, श्लो॰१)
अर्थः- जिनकी गोद में हिमाचल-सुता पार्वतीजी, मस्तक पर गंगाजी, ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा, कण्ठ में हलाहल विष और वक्षःस्थल पर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, संहार-कर्त्ता, सर्व-व्यापक, कल्याण-रुप, चन्द्रमा के समान शुभ्र-वर्ण श्रीशंकरजी सदा मेरी रक्षा करें।
४॰ सुखमय पारिवारिक जीवन
‘श्रीसीता जी के सहित भगवान् राम की स्तुति’ का नित्य पाठ करें।
“नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम,
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम ||” (अयोध्याकाण्ड, श्लो॰ ३)
अर्थः- नीले कमल के समान श्याम और कोमल जिनके अंग हैं, श्रीसीताजी जिनके वाम-भाग में विराजमान हैं और जिनके हाथों में (क्रमशः) अमोघ बाण और सुन्दर धनुष है, उन रघुवंश के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी को मैं नमस्कार करता हूँ।।
५॰ सर्वोच्च पद प्राप्ति
श्री अत्रि मुनि द्वारा ‘श्रीराम-स्तुति’ का नित्य पाठ करें।
छंदः-
“नमामि भक्त वत्सलं । कृपालु शील कोमलं ॥
भजामि ते पदांबुजं । अकामिनां स्वधामदं ॥
निकाम श्याम सुंदरं । भवाम्बुनाथ मंदरं ॥
प्रफुल्ल कंज लोचनं । मदादि दोष मोचनं ॥
प्रलंब बाहु विक्रमं । प्रभोऽप्रमेय वैभवं ॥
निषंग चाप सायकं । धरं त्रिलोक नायकं ॥
दिनेश वंश मंडनं । महेश चाप खंडनं ॥
मुनींद्र संत रंजनं । सुरारि वृंद भंजनं ॥
मनोज वैरि वंदितं । अजादि देव सेवितं ॥
विशुद्ध बोध विग्रहं । समस्त दूषणापहं ॥
नमामि इंदिरा पतिं । सुखाकरं सतां गतिं ॥
भजे सशक्ति सानुजं । शची पतिं प्रियानुजं ॥
त्वदंघ्रि मूल ये नराः । भजंति हीन मत्सरा ॥
पतंति नो भवार्णवे । वितर्क वीचि संकुले ॥
विविक्त वासिनः सदा । भजंति मुक्तये मुदा ॥
निरस्य इंद्रियादिकं । प्रयांति ते गतिं स्वकं ॥
तमेकमभ्दुतं प्रभुं । निरीहमीश्वरं विभुं ॥
जगद्गुरुं च शाश्वतं । तुरीयमेव केवलं ॥
भजामि भाव वल्लभं । कुयोगिनां सुदुर्लभं ॥
स्वभक्त कल्प पादपं । समं सुसेव्यमन्वहं ॥
अनूप रूप भूपतिं । नतोऽहमुर्विजा पतिं ॥
प्रसीद मे नमामि ते । पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥
पठंति ये स्तवं इदं । नरादरेण ते पदं ॥
व्रजंति नात्र संशयं । त्वदीय भक्ति संयुता ॥” (अरण्यकाण्ड)
‘मानस-पीयूष’ के अनुसार यह ‘रामचरितमानस’ की नवीं स्तुति है और नक्षत्रों में नवाँ नक्षत्र अश्लेषा है। अतः जीवन में जिनको सर्वोच्च आसन पर जाने की कामना हो, वे इस स्तोत्र को भगवान् श्रीराम के चित्र या मूर्ति के सामने बैठकर नित्य पढ़ा करें। वे अवश्य ही अपनी महत्त्वाकांक्षा पूरी कर लेंगे।
६॰ प्रतियोगिता में सफलता-प्राप्ति
श्री सुतीक्ष्ण मुनि द्वारा श्रीराम-स्तुति का नित्य पाठ करें।
“श्याम तामरस दाम शरीरं । जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं ॥
पाणि चाप शर कटि तूणीरं । नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं ॥१॥
मोह विपिन घन दहन कृशानुः । संत सरोरुह कानन भानुः ॥
निशिचर करि वरूथ मृगराजः । त्रातु सदा नो भव खग बाजः ॥२॥
अरुण नयन राजीव सुवेशं । सीता नयन चकोर निशेशं ॥
हर ह्रदि मानस बाल मरालं । नौमि राम उर बाहु विशालं ॥३॥
संशय सर्प ग्रसन उरगादः । शमन सुकर्कश तर्क विषादः ॥
भव भंजन रंजन सुर यूथः । त्रातु सदा नो कृपा वरूथः ॥४॥
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं । ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं ॥
अमलमखिलमनवद्यमपारं । नौमि राम भंजन महि भारं ॥५॥
भक्त कल्पपादप आरामः । तर्जन क्रोध लोभ मद कामः ॥
अति नागर भव सागर सेतुः । त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः ॥६॥
अतुलित भुज प्रताप बल धामः । कलि मल विपुल विभंजन नामः ॥
धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः । संतत शं तनोतु मम रामः ॥७॥” (अरण्यकाण्ड)
विशेषः
“संशय-सर्प-ग्रसन-उरगादः, शमन-सुकर्कश-तर्क-विषादः।
भव-भञ्जन रञ्जन-सुर-यूथः, त्रातु सदा मे कृपा-वरुथः।।”
उपर्युक्त श्लोक अमोघ फल-दाता है। किसी भी प्रतियोगिता के साक्षात्कार में सफलता सुनिश्चित है।
७॰ सर्व अभिलाषा-पूर्ति
‘श्रीहनुमान जी कि स्तुति’ का नित्य पाठ करें।
“अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।” (सुन्दरकाण्ड, श्लो॰३)
८॰ सर्व-संकट-निवारण
‘रुद्राष्टक’ का नित्य पाठ करें।
॥ श्रीरुद्राष्टकम् ॥
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥ १॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम् ॥ २॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥ ३॥
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ ४॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥ ५॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ ६॥
न यावत् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत् सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥ ७॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥ ८॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥
॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं संपूर्णम् ॥
विशेषः- उक्त ‘रुद्राष्टक’ को स्नानोपरान्त भीगे कपड़े सहित शिवजी के सामने सस्वर पाठ करने से किसी भी प्रकार का शाप या संकट कट जाता है। यदि भीगे कपड़े सहित पाठ की सुविधा न हो, तो घर पर या शिव-मन्दिर में भी तीन बार, पाचँ बार, आठ बार पाठ करके मनोवाञ्छित फल पाया जा सकता है। यह सिद्ध प्रयोग है। विशेषकर ‘नाग-पञ्चमी’ पर रुद्राष्टक का पाठ विशेष फलदायी है।

श्री रामचरित मानस के सिद्ध ‘मन्त्र’

श्री रामचरित मानस के सिद्ध ‘मन्त्र’

नियम-
मानस के दोहे-चौपाईयों को सिद्ध करने का विधान यह है कि किसी भी शुभ दिन की रात्रि को दस बजे के बाद अष्टांग हवन के द्वारा मन्त्र सिद्ध करना चाहिये। फिर जिस कार्य के लिये मन्त्र-जप की आवश्यकता हो, उसके लिये नित्य जप करना चाहिये। वाराणसी में भगवान् शंकरजी ने मानस की चौपाइयों को मन्त्र-शक्ति प्रदान की है-इसलिये वाराणसी की ओर मुख करके शंकरजी को साक्षी बनाकर श्रद्धा से जप करना चाहिये।
अष्टांग हवन सामग्री
१॰ चन्दन का बुरादा, २॰ तिल, ३॰ शुद्ध घी, ४॰ चीनी, ५॰ अगर, ६॰ तगर, ७॰ कपूर, ८॰ शुद्ध केसर, ९॰ नागरमोथा, १०॰ पञ्चमेवा, ११॰ जौ और १२॰ चावल।
जानने की बातें-
जिस उद्देश्य के लिये जो चौपाई, दोहा या सोरठा जप करना बताया गया है, उसको सिद्ध करने के लिये एक दिन हवन की सामग्री से उसके द्वारा (चौपाई, दोहा या सोरठा) १०८ बार हवन करना चाहिये। यह हवन केवल एक दिन करना है। मामूली शुद्ध मिट्टी की वेदी बनाकर उस पर अग्नि रखकर उसमें आहुति दे देनी चाहिये। प्रत्येक आहुति में चौपाई आदि के अन्त में ‘स्वाहा’ बोल देना चाहिये।
प्रत्येक आहुति लगभग पौन तोले की (सब चीजें मिलाकर) होनी चाहिये। इस हिसाब से १०८ आहुति के लिये एक सेर (८० तोला) सामग्री बना लेनी चाहिये। कोई चीज कम-ज्यादा हो तो कोई आपत्ति नहीं। पञ्चमेवा में पिश्ता, बादाम, किशमिश (द्राक्षा), अखरोट और काजू ले सकते हैं। इनमें से कोई चीज न मिले तो उसके बदले नौजा या मिश्री मिला सकते हैं। केसर शुद्ध ४ आने भर ही डालने से काम चल जायेगा।
हवन करते समय माला रखने की आवश्यकता १०८ की संख्या गिनने के लिये है। बैठने के लिये आसन ऊन का या कुश का होना चाहिये। सूती कपड़े का हो तो वह धोया हुआ पवित्र होना चाहिये।
मन्त्र सिद्ध करने के लिये यदि लंकाकाण्ड की चौपाई या दोहा हो तो उसे शनिवार को हवन करके करना चाहिये। दूसरे काण्डों के चौपाई-दोहे किसी भी दिन हवन करके सिद्ध किये जा सकते हैं।
सिद्ध की हुई रक्षा-रेखा की चौपाई एक बार बोलकर जहाँ बैठे हों, वहाँ अपने आसन के चारों ओर चौकोर रेखा जल या कोयले से खींच लेनी चाहिये। फिर उस चौपाई को भी ऊपर लिखे अनुसार १०८ आहुतियाँ देकर सिद्ध करना चाहिये। रक्षा-रेखा न भी खींची जाये तो भी आपत्ति नहीं है। दूसरे काम के लिये दूसरा मन्त्र सिद्ध करना हो तो उसके लिये अलग हवन करके करना होगा।
एक दिन हवन करने से वह मन्त्र सिद्ध हो गया। इसके बाद जब तक कार्य सफल न हो, तब तक उस मन्त्र (चौपाई, दोहा) आदि का प्रतिदिन कम-से-कम १०८ बार प्रातःकाल या रात्रि को, जब सुविधा हो, जप करते रहना चाहिये।
कोई दो-तीन कार्यों के लिये दो-तीन चौपाइयों का अनुष्ठान एक साथ करना चाहें तो कर सकते हैं। पर उन चौपाइयों को पहले अलग-अलग हवन करके सिद्ध कर लेना चाहिये।
१॰ विपत्ति-नाश के लिये
“राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।।”
२॰ संकट-नाश के लिये
“जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।।
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।”
३॰ कठिन क्लेश नाश के लिये
“हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥”
४॰ विघ्न शांति के लिये
“सकल विघ्न व्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥”
५॰ खेद नाश के लिये
“जब तें राम ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥”
६॰ चिन्ता की समाप्ति के लिये
“जय रघुवंश बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृशानू॥”
७॰ विविध रोगों तथा उपद्रवों की शान्ति के लिये
“दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥”
८॰ मस्तिष्क की पीड़ा दूर करने के लिये
“हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।”
९॰ विष नाश के लिये
“नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।”
१०॰ अकाल मृत्यु निवारण के लिये
“नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।”
११॰ सभी तरह की आपत्ति के विनाश के लिये / भूत भगाने के लिये
“प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन।
जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥”
१२॰ नजर झाड़ने के लिये
“स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।”
१३॰ खोयी हुई वस्तु पुनः प्राप्त करने के लिए
“गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।”
१४॰ जीविका प्राप्ति केलिये
“बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई।।”
१५॰ दरिद्रता मिटाने के लिये
“अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद धन दारिद दवारि के।।”
१६॰ लक्ष्मी प्राप्ति के लिये
“जिमि सरिता सागर महुँ जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।”
१७॰ पुत्र प्राप्ति के लिये
“प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।’
१८॰ सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये
“जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।सुख संपत्ति नाना विधि पावहि।।”
१९॰ ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिये
“साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।”
२०॰ सर्व-सुख-प्राप्ति के लिये
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।।
२१॰ मनोरथ-सिद्धि के लिये
“भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।।”
२२॰ कुशल-क्षेम के लिये
“भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।।”
२३॰ मुकदमा जीतने के लिये
“पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।”
२४॰ शत्रु के सामने जाने के लिये
“कर सारंग साजि कटि भाथा। अरिदल दलन चले रघुनाथा॥”
२५॰ शत्रु को मित्र बनाने के लिये
“गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।”
२६॰ शत्रुतानाश के लिये
“बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥”
२७॰ वार्तालाप में सफ़लता के लिये
“तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा॥”
२८॰ विवाह के लिये
“तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि सँवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला, कुँअरि लई हँकारि कै॥”
२९॰ यात्रा सफ़ल होने के लिये
“प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयँ राखि कोसलपुर राजा॥”
३०॰ परीक्षा / शिक्षा की सफ़लता के लिये
“जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥”
३१॰ आकर्षण के लिये“जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥”
३२॰ स्नान से पुण्य-लाभ के लिये“सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।”
३३॰ निन्दा की निवृत्ति के लिये
“राम कृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।
३४॰ विद्या प्राप्ति के लिये
गुरु गृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल विद्या सब आई॥
३५॰ उत्सव होने के लिये
“सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।”
३६॰ यज्ञोपवीत धारण करके उसे सुरक्षित रखने के लिये
“जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।”
३७॰ प्रेम बढाने के लिये
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
३८॰ कातर की रक्षा के लिये
“मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहिं अवसर सहाय सोइ होऊ।।”
३९॰ भगवत्स्मरण करते हुए आराम से मरने के लिये
रामचरन दृढ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग ।
सुमन माल जिमि कंठ तें गिरत न जानइ नाग ॥
४०॰ विचार शुद्ध करने के लिये
“ताके जुग पद कमल मनाउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।”
४१॰ संशय-निवृत्ति के लिये
“राम कथा सुंदर करतारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी।।”
४२॰ ईश्वर से अपराध क्षमा कराने के लिये
” अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता।।”
४३॰ विरक्ति के लिये
“भरत चरित करि नेमु तुलसी जे सादर सुनहिं।
सीय राम पद प्रेमु अवसि होइ भव रस बिरति।।”
४४॰ ज्ञान-प्राप्ति के लिये
“छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।”
४५॰ भक्ति की प्राप्ति के लिये
“भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपासिंधु सुखधाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।।”
४६॰ श्रीहनुमान् जी को प्रसन्न करने के लिये
“सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।।”
४७॰ मोक्ष-प्राप्ति के लिये
“सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। काल सर्प जनु चले सपच्छा।।”
४८॰ श्री सीताराम के दर्शन के लिये
“नील सरोरुह नील मनि नील नीलधर श्याम ।
लाजहि तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥”
४९॰ श्रीजानकीजी के दर्शन के लिये
“जनकसुता जगजननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।।”
५०॰ श्रीरामचन्द्रजी को वश में करने के लिये
“केहरि कटि पट पीतधर सुषमा सील निधान।
देखि भानुकुल भूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।”
५१॰ सहज स्वरुप दर्शन के लिये
“भगत बछल प्रभु कृपा निधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।”