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Saturday, April 27, 2013

जानमारू है जनकवि होना


"काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में, उतरा है रामराज अब विधायक निवास में" राजनीति पर कटाक्ष करने वाली ये पंक्तियां देश के अदबी और बौद्धिक जमातों में बेहद जानी पहचानी हैं. यह लाइनें जनकवि और आधुनिक कबीर कहे जाने वाले  कवि राम नाथ सिंह "अदम गोंडवी" की हैं. पिछले बरस 18 दिसंबर 2011 को उनकी दुखद मृत्यु पर शोक तो बहुत मनाया गया लेकिन आज साल भर बीतते बीतते ही उस समाज और बौद्धिक जगत के दोहरे चरित्र की पोल खुल गई जो जीते जी अदम को सर माथे पर बिठाने का दम भरता था.और आज उसे उनकी याद तक नहीं.अदम के गांव से हरिशंकर शाही की रिपोर्ट   
"वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं, वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें"  अदम की ही लिखी यह नज़्म वर्ण व्यवस्था में त्याज्य जातियों के हालात पर लिखी थी. लेकिन उनकी मौत के केवल साल भर बीतने के भीतर ही साहित्य और बौद्धिक बिरादरी द्वारा अदम और उनके परिवार से जो बेरुखी दिखाई गई उससे यह नज़्म जनवाद के साहित्य में त्याज्य होने और जनकवि के हालात पर सही बैठने लगी है.
 
उत्तर प्रदेश की राजधानी  लखनऊ से गोंडा जनपद की सडक़ पर इसी जिले के कस्बे कर्नलगंज से करीब 14 किलोमीटर की दूरी दूसरी सडक़ से पूरी करने पर आता है पूरे गजराजसिंह ग्राम पंचायत, जिसमें एक गाँव आटा पड़ता है. यह गाँव किसी भी आम भारतीय या कहें उत्तर प्रदेशीय गाँव की तरह ही है लेकिन मुझे यहाँ तक खींच लाने की उत्सुकता यहाँ के एक निवासी से जुड़ी हुई है. यही गाँव है जनकवि अदम गोंडवी का, जो अपने अदबी नाम "अदम" और उत्तर प्रदेश के अपने गृह जनपद गोंडा की पहचान स्वरूप जुड़े "गोंडवी" के साथ "अदम गोंडवी" नाम से जाने जाते है. जनवाद की अलख को अपने कलम से जगाने और खास तौर पर उत्तर भारत के सामंती समाज और जातीय तथा राजनैतिक विषमताओं के नकाब को उघाड़ कर रख देने का काम अदम अपने जीवन भर बखूबी करते रहे थे. उनकी मौत के साल भर बीतने के बाद यहाँ जाने पर कुछ ऐसा खास नजऱ नहीं आता है जिससे पता चल सके कि यह मशहूर जनकवि अदम का गाँव है.
 
"फटे कपड़ों में तन ढांके गुजरता हो जहाँ कोई, समझ लेना वह पगडंड़ी ‘अदम’ के गाँव जाती है."  अदम की ही लिखी यह पंक्तियाँ उनके गाँव के हालात को साफ़ बयान करती है. जो आज उनके ना होने पर भी खरी उतरती है. आम जन की आवाज़ और गुस्से को कविता की ढाल देने वाले अदम को साहित्यिक बिरादरी ,देश तो क्या उनके गाँव घर के लोगों ने एक साल में ही भुला दिया. पिछले साल भर के धरने प्रदर्शन या फिर सोशल मीडिया में अदम की कविताओं को खूब शेयर किया गया लेकिन उनकी यादों और उनकी कविताओं को सहेजने की कोशिश कहीं नहीं दिखी. उनकी यादों के रूप में उनके द्वारा बरती जाने वाली चीजें हों या अन्य स्मारिका स्वरूप संग्रहणीय वस्तुएं उन पर किसी ने कुछ काम नहीं किया. इसका कोई प्रयास उनकी मौत के साल भर बाद उनके गाँव में कहीं नहीं दिखा.
 
अदम गोंडवी का परिवार संयुक्त परिवार था. आज उनके घर में दो लडक़े हैं जिसमें एक उनके बेटे आलोक और दूसरे भतीजे दिलीप. उनमें से केवल आलोक से मुलाक़ात हो पाती है क्योंकि दिलीप दिल्ली में किसी प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं. आलोक एक तरफ तो अपने पिता की साहित्यिक पहचान से समृद्ध नाम को लेकर गौरवान्वित महसूस तो करते हैं. लेकिन पिता के जीते जी उनकी बीमारी के समय और मृत्यु के बाद मिली गहरी उपेक्षा से आज तक काफी आहत व दुखी हैं.
वह कहते हैं, "जो लोग पिताजी के बहुत खास हुआ करते थे वह भी उनके जाते ही उन्हें  भूल गए, ना तो कोई मदद मिली और ना ही कोई हाल चाल लेने वाला आया." इसके साथ आलोक साहित्यिक जमात की ओर भी सवाल उछालते हैं,"जब किसी को स्मृति अंक, विशेषांक छापना होता है या फिर पिताजी के नाम का इस्तेमाल करना होता है, तभी उन्हें या उनके बहाने हमें याद भी किया जाता है अन्यथा कोई हम लोगों को याद भी नहीं करना चाहता है."
 
परिवार के दूसरे सदस्यों की बातों से यह साफ़ हो जाता है कि अदम की असमय मौत के पीछे सबसे बड़ी वजह तंगदस्ती रही. आलोक बताते हैं कि पैसे की कमी के कारण कैसे लखनऊ पीजीआई में उनके इलाज में जमकर हीलाहवाली हुई यहाँ तक कि उन्हें एक बार बाहर भी कर दिया गया था बाद में मुलायम सिंह यादव के हस्तक्षेप की वजह से वहां उनका इलाज हो सका. उनके पारिवारिक हालात तो इस तरह खराब हो चुके हैं कि अब उनके पास जीवन यापन के लिए कुछ खास बचा ही नहीं और खराब आर्थिक हालत के चलते उनके लडक़े और भतीजे भी खास पढ़ लिख नहीं पाए, यही वजह है कि आज वे बेहतर नौकरी के अभाव में तंगहाली की दशा में समय गुजारने को मजबूर हैं.
 
अदम के परिवार के दोनों बेटों में से एक आलोक गाँव में थोड़ी बहुत बची खुची खेती कर रहे हैं और भतीजे दिलीप दिल्ली में छोटी मोटी नौकरी. आलोक बातचीत में बताते हैं "पिताजी ने अपने जीवन काल में घर चलाने के लिए बहुत सा कज़ऱ् ले रखा था जिसे चुकाने में ही काफी कुछ खत्म हो गया. " वहीँ मदद के बारे में पूछने उनका कहना था, "पिता जी के अवसान के समय गोंडा के तत्कालीन जिलाधिकारी राम बहादुर जी ने व्यक्तिगत रुचि दर्शाते हुए हमारी भारी मदद की जिससे उनके द्वारा लिए गए कज़ऱ् के करीब ढाई लाख रुपयों को चुकाया जा सका. उनके ट्रांसफर हो जाने के बाद कोई फिर कोई पुरसाहाल नहीं बचा."
 
वे पिता के सक्रिय जीवन काल में भी साहित्यिक निष्ठुरता को याद करते हुए बताते हैं, "बाबूजी के साथ हम कई कवि सम्मेलनों में जाते थे और देखते थे कि जिसने जो दे दिया उन्होंने बिना किसी ना नुकूर के उसे ले लिया पैसे की कोई मांग वह कभी करते ही नहीं थे." आलोक एक बार दिल्ली के एक कवि सम्मलेन के बारे में बताते हैं जहाँ लौटने के समय केवल दो हज़ार रूपये दिए गए थे, जिसमें पिता पुत्र दोनों की वापसी का खर्च भी शामिल था.
 
परिवार से यह भी जानकारी मिली की उनकी किताब के एक स्वनामधन्य प्रतिष्ठित प्रकाशक ने रायल्टी के लिए परिवार वालों को काफी परेशान किया और अंत में यह लोग तंग होकर उसके यहाँ से वापस चले आए. जबकि यह प्रतिष्ठान काफी बड़ा और समृद्ध पब्लिशिंग हाउस है. यह हालात साहित्यिक कोनों की असंवेदनशीलता का साफ़ परिचय देता है.
 
आज उनके परिवार और घर को संजोने वाला कोई नहीं दिखता है. आलोक बताते हैं कि इससे बड़ी असंवेदनशीलता और क्या होगी कि,"अपने पिता की स्मृति में  आयोजित कवि सम्मलेन के दौरान मुझे भीड़ में गुम, बिना किसी खास पहचान के साथ खड़ा रहना पड़ता है. जबकि उस सम्मलेन में देश के बड़े साहित्यिक नाम मेरे ही पिता को याद कर उनकी विरुदावली गा रहे रहे थे."
 
आलोक से बात खत्म करते समय और जनकवि होने के बारे में उनकी धारणा पूछने पर वह एक सांस में कह जाते हैं,"आम जनता को जगाना, देश को चेताना अगर ऐसा होता है,समाज के सच को मुखरता और साफगोई से सामने लाना और इसके लिए त्याग करने का अगर यही कुफल मिलता है तो साफ बात हैअब हम ऐसा जनकवि नहीं चाहेंगे कि उनकी पीढियां बर्बाद हो जाएं". इन शब्दों के बाद कुछ कहने और सुनने की गुंजाइश समाप्त हो जाती है और अब आगे के सारे सवाल उस समाज, जिसमें हम सब हैं और समाज की बौद्धिक बिरादरी की ओर भी उठ जाते हैं जो बातें तो बड़ी बड़ी करते हैं लेकिन हकीकत उससे उलट होती है.
 
आज दिल्ली में हुए बलात्कार कांड की आवाज़ जोर शोर से उठाई जा रही है लेकिन अदम ने अपने समय  में ही अपनी एक चर्चित कविता में गाँव के सवर्ण वर्ग जिसमें उनके स्वजातीय लोगों के द्वारा एक दलित लडक़ी के बलात्कार का भरपूर विरोध और समाज और प्रशासनिक व्यवस्था पर तंज करते हुए इस तरह किया कि उन्हें अपने ही गाँव में इसका विरोध झेलना पड़ा था लेकिन अदम अपनी बात से पीछे नहीं हटे.
 
अदम की शख्सियत ऐसी रही  की उनकी पहचान उनकी कविताओं से काफी दूर तलक है. उनके बारे में दिल्ली में मौजूद केरल कैडर के आईएएस अधिकारी उमेश सिंह चौहान जिनकी साहित्य में काफी दखल है वह कहते हैं "अदम गोंडवी से मैं कभी मिला नहीं, लेकिन एक लंबे अरसे से मैं उनकी शायरी का कायल रहा हूँ. शोषण, अन्याय व दोगलेपन के खि़लाफ बेबाकी से लिखने वाले तथा भूख व अन्य समस्याओं का निदान केवल क्रांति के जरिए देखने वाले अदम गोंडवी शखि़्सयत सचमुच निराली थी." अदम के बारे में वह अपनी बात एक कविता से ही खत्म करते हैं "वो बाग़ी शायर था, जियाला था, ‘समय से मुठभेड़’ करने वाला था, सच वो कहता था तान के सीना, वो अदम गोंडवी था या ‘निराला’ था. "
 
अदम जो अपनी ठेठ  ग्रामीण पहचान के साथ  दिल्ली सरकार और सामाजिक  सरोकारों पर चोट करने के लिए  जाने जाते रहे हैं. लेकिन आज उनका और उनके परिवार को इस प्रकार भुला दिया जाना कहीं ना कहीं एक गहरा दर्द छोड़ जाता है.एक चोट सी लगती है दिल पर एक टीस सी उठती है मन में. 
 

सच मानिए, अब मुहब्बत के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है

 सच मानिए, अब मुहब्बत के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है! प्रेम से वंचित होते इस समाज में इश्क के रास्ते की अड़चन सरकार भी होगी! अब तक प्रेम के शत्रु हिंदुत्व के ठेकेदार, खाप पंचायतें, दारोगा और जाति-मजहब के नियमों से संचालित स्वयंप्रभु संगठन थे। दुनिया भर के साहित्य और इतिहास में दर्ज प्रेम कथाएं बताती हैं कि प्रेम का रास्ता कांटों का रास्ता है। बकौल जिगर मुरादाबादी- ‘एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’ पर यौन हिंसा के खिलाफ बनाए गए नए कानून के कुछ प्रावधानों के मुताबिक इस दरिया का रास्ता जेल ले जाएगा। पीछा किया तो कैद, भर आंख देखा तो हवालात तय जानिए। खयाल रहे, कोई पुलिसकर्मी आपकी आंखों पर पहरा दे रहा होगा।
सच है, आंखें जुबां नहीं हैं, मगर बेजुबां भी नहीं। उनकी भी भाषा है। कौन पढ़ेगा इसे? निराला कह गए- ‘नयनों से नयनों का गोपन, प्रिय संभाषण।’ अब कानून कह रहा है कि चौदह सेकेंड से ज्यादा किसी लड़की को देखा तो जेल जाएंगे। बढ़ती उम्र से नजरें तो कमजोर होती ही हैं। मुझे इन दिनों दूर की कोई वस्तु देखने के लिए आंख को फोकस करने में पंद्रह से बीस सेकेंड लगते हैं। अब जब तक मैं आंखों को फोकस करूंगा चौदह सेकेंड हो चुके होंगे और मुझे घूरने के कानून में अंदर जाना होगा! चचा ़ग़ालिब कहते हैं- ‘उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक।’ आज होते तो कहते, अब उनको देखे से खुलता है हवालात का दर! जगजीत सिंह गाते थे- ‘तुमको देखा तो ये खयाल आया, जिंदगी धूप तुम घना साया...!’ पर अब...! पारखी से ही हीरे की पहचान होती है, वरना वह तो पत्थर ही रहेगा। मेरे एक मित्र हैं तिवारी जी। सौंदर्य के चरम उपासक। देखते कहीं और हैं ध्यान में कुछ और रहता है। अब दारोगा उन्हें इस काम का तीसरा आयाम भी दिखा देगा!
तो क्या दारोगा के डंडे से प्रेम मर जाएगा? नहीं, प्रेम ऊर्जा है। वैज्ञानिक कहते हैं ऊर्जा का क्षय नहीं, रूपांतरण होता है। अगर चीजों में आकर्षण न हो तो सृष्टि बिखर जाएगी। इस ब्रह्मांड की बाहरी परिधि में ढेर सारे उपग्रह हैं जो एक दूसरे के आकर्षण पर टिके हैं। स्त्री-पुरुष के आकर्षण पर ही समाज टिका है। आकर्षण बिना देखे हो नहीं सकता- ‘नयनों से नयना मिले, नाचा मन में मोर। दो नयनों में रतजगा, दो नयनों में भोर।’
पर जेल जाने का कानून अगर पहले बना होता तो मैं वर्षों तक जेल में रहता! नौजवानी के दिनों में कोई सात बरस तक मैं उनके पीछे-पीछे टप्पेबाजी करता रहा। चरैवेती-चरैवेती! शहर से विश्वविद्यालय तक वे रिक्शे पर, मैं साइकिल से। तब साइकिल मुलायम सिंह यादव का चुनाव निशान नहीं थी! मेहनत रंग लाई। वे मान गर्इं। आज घर की मालकिन हैं। तब यह कानून होता तो मेरे ऊपर सजायाफ्ता मुजरिम का ठप्पा होता। उनके भाई तो कानून के बड़े जानकार थे। भारत सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता। 
पर मैं इस कानून के खिलाफ नहीं हूं। जिन परिस्थितियों में यह कानून बना, उनमें तो इससे भी सख्त कानून बनना चाहिए। लेकिन जो बाकी की धाराएं हैं, उनसे पुलिस को बेहिसाब अधिकार मिलेंगे और उनके बेजा इस्तेमाल भी होंगे। कानून की ऐसी वर्जना पहले होती तो दुनिया की तमाम प्रेम कहानियां जन्म ही न लेतीं। रूपमति-बाजबहादुर, सलीम-अनारकली, ढोला-मारु। इनके प्यार के विरोधी परिजन इन्हें कानून के तहत अंदर करा देते। मजनू पागल होकर कविता नहीं लिख रहा होता, बल्कि कब्र तक लैला का पीछा करने के आरोप में कहीं अरब की जेल में होता। हीर जब रांझा की नहीं हुई तो वह जोगी हो हीर को ले उड़ा। दूसरे की बीवी भगाने के आरोप में रांझा को जेल काटनी पड़ती। सोहनी-महिवाल, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट कथाओं के पात्र आजन्म घूरने, पीछा करने जैसे आरोपों में जेल की चक्की पीस रहे होते। कालिदास और तुलसीदास की पत्नियों ने उन्हें घर से निकाला। कानून नहीं था, वरना उन्हें जेल भी भिजवा दिया जाता। फिर हिंदी और संस्कृत साहित्य का क्या होता!
डॉ लोहिया ऐसे मामलों में रास्ता निकालते हैं। वादाखिलाफी और बलात्कार को छोड़ कर वे स्त्री से हर संबंध जायज मानते हैं। प्यार को जकड़ने की ऐसी कोशिश कोई पहली बार नहीं हुई है। समान गोत्र में प्रेम का विरोध खाप पंचायतें करती हैं। जाति-मजहब के खिलाफ प्रेम किया तो हरियाणा, उत्तर प्रदेश की पंचायतें तालिबानी फरमान सुनाती हैं। प्रेमियों को मौत के घाट उतारा जाता है। मुंबई पुलिस के एक फरमान से ‘डेट करने वाले’ और ‘एकांत’ में बैठने वाले हवालात के अंदर हो रहे हैं।
पूरा रीतिकालीन साहित्य आंखों की भाषा पर है। रहीम कहते हैं- ‘रहिमन मन महाराज के, दृग सों नहीं दिवान। जाहि देख रीझे नयन, मन तेहि हाथ बिकान।’ इश्क ने ग़ालिब को निकम्मा बना दिया। इश्क उनके लिए आसान नहीं था। अब तो और भी मुश्किल हो जाएगा। पुलिसकर्मी के रहमोकरम पर। खुदा बेगुनाहों को कानून की मार से बचाए!

अकेलेपन का अंधेरा

पिछले दिनों वृंदावन में एक महिला सदन में सरस्वती मां से मुलाकात हुई। उनकी उम्र अस्सी साल के आसपास होगी। हाथ में पकड़ी लाठी उनका एकमात्र सहारा है। गरीब बेटे का परिवार उन्हें बोझ की गठरी समझता और रोजाना विधवा होने के ताने मारता था। बेटे से यह सब सहा नहीं गया और उसने खुदकुशी कर ली। अपने वैधव्य को कोसती हुई वे अपनी बाकी जिंदगी किसी तरह काट लेने पश्चिम बंगाल से उत्तर प्रदेश के वृंदावन चली आर्इं। अब वे वहां बस अपनी आखिरी सांस का इंतजार कर रही हैं और उनकी ख्वाहिश खामोशी से इस दुनिया से चले जाने की है। मैं सोच रही थी कि कितनी पीड़ा से भरी होती होगी हर रोज आखिरी सांस के इंतजार में फंसी जिंदगी। मान्यता है कि हिंदुओं के एक भगवान कृष्ण ने वृंदावन के आसपास अपना बचपन गुजारा था। उन्हीं की भक्ति में लीन मोक्ष प्राप्ति की उम्मीद में आज वहां वैसी बहुत सारी महिलाएं किसी तरह अपना बाकी बचा वक्त काट रही हैं, घर में जिनकी जगह पति की मौत के साथ ही खत्म हो गई।
वृंदावन को आज विधवाओं की नगरी नाम से जाना जाता है। यहां अधिकतर विधवा और बेसहारा महिलाएं पश्चिम बंगाल से हैं। मुझे बताया गया कि तकरीबन पांच सौ साल पहले कृष्ण-भक्त कवि चैतन्य महाप्रभु वृंदावन आए थे और उन्होंने अपना बाकी जीवन यहीं गुजार दिया। यह वह दौर था, जब बंगाल में बहुत कम उम्र में लड़कियों का विवाह कर दिया जाता था। अगर किसी वजह से उनके पति की मौत हो गई तो उन्हें परिवार और समाज तिरस्कृत निगाहों से देखता था। चैतन्य महाप्रभु के मुताबिक ‘व्यर्थजीवना’, ‘भाग्यहीनाओं’ को किन्हीं तीर्थ में या वृंदावन में वास कर ईश्वर-भक्ति में ध्यान लगा अपनी यह अभिशप्त कष्टमय उम्र सार्थक बना कर व्यतीत करना ही आदर्श है।
विधवाओं के विवाह के लिए काम करने वाले ईश्वरचंद्र विद्यासागर के आंदोलन का कितना असर हुआ, यह मुझे नहीं मालूम। लेकिन इसके बरक्स स्त्री विरोधी परिवारिक और सामाजिक व्यवस्था में सुधार करने के बजाय विधवा होने पर उससे छुटकारा पाने के तरीके जरूर सोचे गए। सती प्रथा एक जीवित स्त्री को उसके स्त्री होने की सजा देने का क्रूरतम तरीका थी और यह हमारे समाज की एक ऐसी कलंकित परंपरा रही, जिसकी खबरें आज भी कहीं-कहीं से आ जाती हैं। एक बहुत पुरानी खबर है, लेकिन उसके संदर्भ से आज भी दिल दहल जाता है। नवंबर 1852 में एक अखबार में यह खबर छपी कि भुज में एक महिला को एक प्रभुत्वशाली उच्च सामाजिक वर्ग के लोग उसके पति की चिता पर बिठाना चाहते थे। लेकिन वह मरना नहीं चाहती थी। अंग्रेज अधिकारियों को इन नृशंस इरादों का पता चला और वे मौके पर उसे बचाने पहुंचे। इसके बाद वहां मौजूद लोगों ने चिता की घेरेबंदी कर ली और उस महिला के सिर के टुकडे-टुकड़े कर दिए।
आधुनिक खयाल और अधिकारों के इस युग में अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों ने पारिवारिक और वैवाहिक संबंधों की पकड़ को ढीला जरूर किया है, पर संस्कारों की जकड़नें कमोबेश वैसी ही हैं। करीब ढाई दशक पहले राजस्थान के दिवराला में रूपकंवर को उसके रिश्तेदारों ने जबरन पति की चिता पर बिठा कर जला दिया था। उसके ‘सती’ होने को महिमामंडित किया गया। सदियों पहले महिलाएं बंगाल से वृंदावन कैसे और क्यों गई होंगी? दुख, अत्याचार और त्रासदी का महिमामंडन कैसे किसी व्यक्ति को प्रश्नों से रहित कर देता है?
आज वृंदावन में अपने अकेलेपन का अभिशाप झेलती कमजोर बुजुर्ग महिलाएं रोजाना औसतन चार-पांच किलोमीटर पैदल चल कर चार-पांच रुपए कमाने मंदिरों में जाती हैं। उन्हें वहां कई-कई घंटे लगातार भजन करना पड़ता है। शरीर साथ नहीं देता, पांव थक जाते हैं, लेकिन पेट की आग ने सूजे, कराहते पैरों की पीड़ा को लीलना शायद अपना धर्म बना लिया है! अधिकतर को यह घुट्टी पिला दी गई है कि इस संकरी गली का दरवाजा मत खोलना। यहां तक कि बाहर झांकना भी पाप है! न जाने कृशकाय शरीर वाली मांएं तन-मन की शुद्धि के लिए कितने उपवास रखती होंगी! मैं जिस दिन उनसे मिलने गई थी, उस दिन भी उन महिलाओं ने उपवास रखा हुआ था। मुझे समझ में आया कि विवाहित महिलाओं की तुलना में विधवाओं के बीच कुपोषण की दर पचासी फीसद ज्यादा होने की वजह क्या है।
पागल बाबा नाम से एक सौ साल पुरानी इमारत के पास एक बहुत छोटे कमरे में किराए पर पांच बच्चों के साथ रहने वाली शर्बती गली में खड़ी होकर इन महिलाओं की जिंदगी के बारे में कुछ कहने से बचती रही। लेकिन अपने कमरे के भीतर बिछौने पर दौड़ते चूहे को किनारे कर मुझे बिठाते हुए बोली- ‘चूहों से मत डरो। यहां डराने के लिए विधवाओं का चलता-फिरता कष्टों से भरा जिंदगीनामा ही काफी है!’

यौन हिंसा की जड़ें

 सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा की अध्यक्षता में भारत सरकार द्वारा गठित समिति का उद्देश्य था आपराधिक कानूनों और अन्य प्रासंगिक कानूनों में ऐसे संभव संशोधन सुझाना ताकि ‘महिलाओं पर चरम यौन हमलों के मामलों में तेजी से फैसला हो सके और मुजरिमों को कहीं ज्यादा सजा दिलाई जा सके।’ अभी इस समिति को बने ज्यादा समय नहीं हुआ कि बलात्कार की अन्य हालिया घटनाओं में बहुत जल्द न्यायिक फैसले करने के उदाहरण सामने आ रहे हैं। इसका अर्थ साफ है कि न्यायिक व्यवस्था भी देखती है कि कौन-से अपराध पर सरकार गंभीर होने का संकेत दे रही है। सरकार ने लोकसभा में पिछले साल 19 अक्तूबर को एक विधेयक पेश किया था, जिसमें कहा गया था कि यौन हमला एक लिंग-निरपेक्ष अपराध है। इस विधेयक में भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं में यौन हमले को लिंग-निरपेक्ष बनाने के लिए कई संशोधनों का प्रस्ताव किया गया है। अगर यौन हमले को लिंग-निरपेक्ष अपराध मान लिया जाए तो महिलाओं के खिलाफ यौन हमले का सवाल ही महत्त्वहीन हो जाता है। वर्मा समिति को सबसे पहले इन संशोधनों को वापस लेने की सिफारिश करनी चाहिए थी।
दूसरे, उन लोगों के प्रति कानून और भी सख्त होना चाहिए, जिनका काम कानून की रक्षा करना है। सरकारी कर्मचारियों, पुलिसकर्मियों, जेल प्रबंधकों के साथ-साथ सेना, अर्द्धसैनिक बलों आदि के लोगों से सख्ती से पेश आना होगा। मणिपुर की थांगजाम मनोरमा, कश्मीर की नीलोफर और अशिया, और हजारों आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं से, विशेषकर गुजरात दंगों में, बलात्कार करने के बाद हत्याएं करने की कई घटनाएं सामने आई हैं। इन्हें ‘विरल में भी विरलतम’ की श्रेणी में रख कर दोषी फौजियों, पुलिसकर्मियों और दंगाइयों को फांसी की सजा देनी चाहिए क्योंकि ये केवल बलात्कार के नहीं, हत्या के भी मामले हैं। दिल्ली बलात्कार कांड के अपराधी भी इसी श्रेणी में आते हैं।
संगीनतर यौन हमलों में सामूहिक बलात्कार, संरक्षण में बलात्कार, बच्चों से बलात्कार, सांप्रदायिक और जातिवादी हिंसा के अंतर्गत हुए बलात्कार, मानसिक या शारीरिक रूप से अपंग के साथ बलात्कार आदि शामिल होने चाहिए। ऐसे मामलों में कठोर आजीवन कारावास का प्रावधान होना चाहिए जो अपराधी की स्वाभाविक मृत्यु तक चले।
बलात्कार के सभी मामलों में समयबद्धता का ध्यान रखा जाए। अमूमन तीन महीनों में फैसला सुना देना चाहिए। यौन हिंसा के एक लाख से ज्यादा मामले अदालतों में लंबित हैं। उन्हें त्वरित अदालतों को हस्तांतरित करना चाहिए। जावेद अख्तर ने बिल्कुल सही कहा है कि जो सजा वर्तमान कानून में बलात्कार के लिए निर्धारित है, वह भी कितने अपराधियों को दी जाती है। 
दिल्ली में जो प्रदर्शन हुए, उनमें अधिकतर प्रदर्शनकारियों की तख्तियों पर ‘बलात्कारियों को फांसी दो’ या ‘बधियाकरण’ की मांगें लिखी हुई थीं। यह बात किसी हद तक सही है कि आज समाज में कानून का डर नहीं रह गया है। लेकिन बलात्कार का मामला चोरी-डकैती, लूटपाट, हत्या जैसे अपराधों से भिन्न है। यह केवल कानून को कठोर बनाने से खत्म नहीं होगा। इसकी जड़ें हमारी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था और जनमानस के सोच में बहुत गहराई तक धंसी हैं। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ कठोर कानून बनाए जाने के बावजूद महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाओं में कमी नहीं आ पाई है। 
यूरोप में एक जमाने में खरगोश चुराने पर फांसी दे दी जाती थी। यह दौर खत्म हुआ तो नाजियों ने अपराध को खत्म करने के लिए अपराधियों को ही खत्म करने का तर्क दिया। हिटलर के शासन में फ्रीजलर नाम के कानूनमंत्री का विश्वास था कि दंड को इतना कठोर बना दो कि लोग अपराध करने से पहले कांपने लगें। इन तमाम उपायों ने आज तक अपराध को खत्म करने में सफलता नहीं पाई है।
समस्या यह है कि कानून बनाने वालों से लेकर उन्हें लागू करने वालों तक के सोच में ही गड़बड़ है। जरा देखें कि हमारे न्यायाधीशों की एक जमात औरत के बारे में क्या सोचती है। कल्याणी मेनन और एके शिवकुमार द्वारा लिखित पुस्तक (भारत में स्त्रियां) में 1996 में किए गए एक अध्ययन का जिक्र है, जिसमें औरतों के खिलाफ हिंसा के बारे में 109 न्यायाधीशों से लिए गए साक्षात्कारों का निचोड़ दिया गया है। इसके कुछ अंश इस प्रकार हैं।
अड़तालीस प्रतिशत न्यायाधीशों का मानना था कि कुछ मौके ऐसे होते हैं जब पति द्वारा पत्नी को थप्पड़ मारना जायज होता है। चौहत्तर प्रतिशत का मानना था कि परिवार को टूटने से बचाना ही औरत का पहला सरोकार होना चाहिए, चाहे वहां उसे हिंसा का सामना ही क्यों न करना पड़ता हो। अड़सठ प्रतिशत का मानना था कि ‘उत्तेजक’ कपड़े पहनना यौन हमले को बुलावा देना है। पचपन प्रतिशत का मानना था कि बलात्कार के मामले में औरत के नैतिक चरित्र की अहमियत है।
इसी प्रकार पुलिस में जो लोग काम करते हैं, उनका क्या सोच है? एक किस्सा मैंने सोमनाथ चटर्जी के मुख से सुना है। उन्होंने बताया कि हरियाणा में एक औरत को जब उसके पति ने पीटा तो वह थाने पहुंची। थानेदार ने उसकी कहानी सुनी और पति को थाने में बुलवाया। पति से उसने एक ही सवाल पूछा कि शिकायतकर्ता क्या उसकी जोरू है? जब उसने ‘हां’ में जवाब दिया तो उसे बिना कुछ कहे थानेदार ने घर भेज दिया। फिर औरत से कहा, ‘तेरा पति अगर अपनी लुगाई (पत्नी) को नहीं पीटेगा तो क्या पड़ोसी की लुगाई को पीटेगा?’ इस तरह उसने औरत को भी डांट कर उसके घर भेज दिया।
पिछले दिनों ‘तहलका’ पत्रिका ने दिल्ली के विभिन्न इलाकों में तैनात पुलिसकर्मियों के साक्षात्कार प्रकाशित किए हैं जिनमें दो को छोड़ कर सभी की राय थी कि जो महिलाएं बलात्कार की शिकायत दर्ज कराने थाने में आती हैं, वे या तो अनैतिक, स्वच्छंद स्वभाव की, चरित्रहीन होती हैं, या वेश्याएं होती हैं और वे पुरुषों को ब्लैकमेल करना चाहती हैं। जिनके कंधों पर महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, उन्हें अगर अपना सोच बदलने के लिए प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा तो परिवर्तन कैसे होगा?
यह बात भी समझने की है कि बलात्कार केवल यौन-लिप्सा मिटाने का मामला नहीं है, यह एक महिला पर अपना प्रभुत्व जमाने का भी मामला है। सोलह दिसंबर के सामूहिक बलात्कार के मुख्य आरोपी ड्राइवर रामसिंह ने कहा है कि उसे सबसे अधिक गुस्सा तब आया जब पीड़िता ने उसका खुला विरोध किया। जब आसाराम बापू यह कहते हैं कि लड़की को बलात्कारियों के पैरों में पड़ जाना चाहिए था, तो वे एक तरह से ड्राइवर रामसिंह के सोच का ही समर्थन कर रहे होते हैं। यह सोच, केवल आसाराम बापू का नहीं है, हमारे अधिकतर राजनीतिकों का भी है, वे मर्द हों या औरत, मोहन भागवत हों या ममता बनर्जी।
जिन लोगों ने दिल्ली में छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया, वे इसी समाज के बाशिंदे हैं। यह वह समाज है जहां विज्ञापनों और फिल्मों में औरत को लगभग नंगा दिखा दिया जाता है। यहां ‘मुन्नी बदनाम हुई’, ‘शीला की जवानी’ के बाद ऐसे गानों के बोलों पर कोई रोक नहीं कि ‘मैं तंदूरी मुर्गी हूं यार, घटका ले मुझे एल्कोहोल से’ (दंबग-2 का फेवीकोल वाला गीत)। सामूहिक बलात्कार करने वाले ड्राइवरों और रिक्शाचालकों के शैक्षिक स्तर को देखें। उन्हें एक सभ्य मनुष्य बनाने के लिए इस व्यवस्था ने कितना खर्च किया है, इस पर भी सोचना होगा।  क्या वे समझ सकते हैं कि एक पारा-मेडिकल छात्रा इस समाज को कितना कुछ दे सकती है और उसकी हत्या नहीं करनी चाहिए। इन लोगों ने औरतों को केवल अपने घरों में खटते देखा है। उन्होंने शराबी पिता और घर में चाचा-ताऊ की जबर्दस्त हिंसा झेलती हुई अपनी बहनों और मांओं को देखा है। उन्होंने युवा होते-होते देखा है कि घर के परेशानहाल पुरुष उनके साथ समाज में हो रहे अत्याचारों का बदला घर की औरत की देह से लेते हैं। और घर अगर गांव में हो, तो शहर में चलती-फिरती कोई भी औरत उनका शिकार हो सकती है।
उड़नशील विदेशी और देसी पूंजी महिलाओं को घर से बाहर आने के लिए आमंत्रित कर रही है, पर समाज अब भी पुरुषवादी वर्चस्व को बनाए रखना चाहता है। उद्योगीकरण के लिए, औरत-मर्द की समानता का प्रश्न इसलिए केंद्रीय महत्त्व का है।
नेहरू ने कहा था कि भारत में प्रगति का यह आलम है कि एक तरफ नाभिकीय संयंत्र हैं तो दूसरी तरफ गोबर का चूल्हा। आज भी हम देखते हैं कि बड़े-बड़े शहरों में सड़कों पर भैंसा-बुग्गी के साथ-साथ मर्सिडीज बैंज दौड़ती हुई दिखाई देती है। लालबत्ती पर गौर से देखने पर इन लंबी-लंबी कारों में अनपढ़ गंवार युवा भी दिखाई दे जाते हैं।
यह नवधनाढ्य वर्ग है जिसके पास पिछले कुछ वर्षों में नवउदारवादी नीतियों के कारण बहुत पैसा आ गया है। प्राय: इनके पास पुश्तैनी जमीन है, जो शहरों में बड़े-बड़े मॉल बनाने की जरूरत के चलते बहुत महंगी हो गई है। युवाओं के पास पचास-पचास हजार के मोबाइल और घड़ियां, लेकिन शिक्षा के नाम पर सिफर। ऐसे लड़के जब शहरों और कस्बों में अपनी गाड़ियों में निकलते हैं तो महिलाएं इनका पहला शिकार बनती हैं।
संपन्नता और ऊंचे रसूख के कारण इस वर्ग के बलात्कारी एक ही रात में जमानत लेकर छूट जाते हैं। पकड़ में आते हैं तो रिक्शाचालक, ट्रक ड्राइवर आदि। इसका अर्थ यह नहीं कि दरिद्र वर्ग के लोगों को बलात्कार करने का अधिकार है। पर हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए, जैसा कि डायसन कार्टर ने अपनी मशहूर पुस्तक ‘पाप और विज्ञान’ में लिखा है कि ‘‘प्रत्येक अपराध का बीज समाज में मौजूद होता है। समाज ही उन परिस्थितियों को जन्म देता है जिनसे अपराध के लिए इंसान को बढ़ावा मिलता है।’’
एक और बात! बलात्कार का अर्थ इज्जत का चले जाना नहीं होना चाहिए। दरअसल, इज्जत तो बलात्कारी की जानी चाहिए जैसे किसी लुटेरे या जेबकतरे की जाती है, पर हमारे यहां इसे औरत की इज्जत से जोड़ दिया गया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 354 और 509 में भी ‘महिला के मान भंग करने’ का जिक्र है।
सुषमा स्वराज ने बलात्कार की शिकार महिलाओं को जिंदा लाश ही कह डाला। क्या कौमार्य खो जाने से एक स्त्री के जीवन का मूल्य खत्म हो जाता है? इस धारणा को खारिज करने की जरूरत है कि औरत की इज्जत उसकी योनि में है। यह उतनी ही बेहूदा बात है कि कोई यह कहे कि एक पुरुष की बुद्धिमता उसके जननांग में होती है। बलात्कार जघन्य अपराध है, इसमें दो राय नहीं, पर एक औरत की जिंदगी में बहुत-सी परेशानियां, पेचीदगियां हैं जैसे किसी पुरुष की जिंदगी में। बहुत-सी नारीवादी स्त्रियां पितृसत्ता से नफरत करते-करते पुरुषों से ही नफरत करने लगती हैं। सवाल पितृसत्तात्मक व्यवस्था को खत्म करने का है, पुरुषों को नहीं। मुक्तिकामी जनता- जिसमें पुरुष और स्त्रियां दोनों शामिल हैं- के संघर्षों का हिस्सा बन कर ही स्त्रियों समेत शोषित-पीड़ित वर्गों की आजादी और इज्जत की रक्षा की जा सकती है।

Friday, April 26, 2013

समाचार और संवाददाता


समाचार और संवाददाता

समाचार क्या?
हिन्दी के शब्द समाचार का अर्थ सम्यक आचरण करना या व्यवहार बतलाना है।
हिन्दी भाषा के समाचार को अंग्रेजी में न्यूज कहा जाता है। अंग्रेजी का न्यूज शब्द न्यू का बहुवचन है, जो कि अंग्रेजी वर्णमाला के चार अक्षरों NEW और Sसे मिलकर बना है। ये चार अक्षर North, East, West और South क्रमश:उत्तर, पूर्व, पश्चिम और दक्षिण के द्योतक हैं तथा इन चारों दिशाओं में हो रही विविध घटनाओं की जानकारियों व सूचना का संकलन समाचार कहलाता है।
अंग्रेजी का न्यू शब्द लैटिन के नोवा और संस्कृत के नव शब्द का पर्याय है, जिसका अर्थ है नवीन या नूतन।
समाचार शब्द वृत्तांत, खबर, संवाद, विवरण, सूचना आदि नामों से भी जाना जाता है।
कई विद्वान, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों ने समाचार के सम्बंध में अपने-अपने विचार व मत प्रकट किये हैं, जिसके अनुसार – समाचार सामयिक असामान्य विचार, घटना या विवाद के ऐसे तथ्यपूर्ण, शुद्ध, निष्पक्ष व सरस विवरण होते हैं जो बहुसंख्यकों की अधिकतम अभिरुचियों को एक साथ प्रभावित करते हैं।
विलियम एम. माल्सबाई के अनुसार – किसी समय में होने वाली उन महत्वपूर्ण घटनाओं के सही और पक्षपातरहित विवरण को, जिसमें उस पत्र के पाठकों की अभिरुचि हो, समाचार कहते हैं। जार्ज एच. मौरिस के मतानुसार – समाचार जल्दी में लिखा गया इतिहास है। जे.जे.सिंडलर की राय में – पर्याप्त संख्या में मनुष्य जिसे जानना चाहे वह समाचार है। शर्त यह है कि सुरुचि तथा प्रतिष्ठा के नियमों का उल्लंघन न करें। एम. लाइस स्पेंसर के विचारानुसार – वह सत्य घटना या विचार जिसमें बहुसंख्य पाठकों की अभिरुचि है समाचार है। प्रो. विलियम ब्लेयर की राय में – अनेक व्यक्तियों की अभिरुचि जिस सामयिक बात में हो वह समाचार है। सर्वश्रेष्ठ समाचार वह है जिसमें बहुसंख्यकों की अधिकतम रुचि हो।
विलियम एल. रिवर्स के मतानुसार – समाचार घटना का वर्णन है। घटना स्वयं समाचार नहीं है। घटनाओं, तथ्यों और विचारों की सामयिक रिपोर्ट समाचार है, जिसमें पर्याप्त लोगों की रुचि हो। रा.रा. खांडेलकर के अनुसार – दुनिया में कहीं भी किसी समय कोई छोटी-मोटी घटना या परिवर्तन हो उसका शब्दों में जो वर्णन होगा उसे समाचार कहते हैं। टर्नर कालेज के विचारानुसार – वह सभी कुछ जिससे आप कल तक अनभिज्ञ थे, समाचार है। अंबिका प्रसाद वाजपेयी के अनुसार – हर घटना समाचार नहीं है, सिर्फ वही घटना समाचार बन सकती है जिसका कमोबेश सार्वजनिक हित हो, अस्पतालों में लोग भर्ती होते रहते हैं, अच्छे होते हैं और मरते भी हैं। लेकिन कोई मरीज इसलिये मर जाए कि अस्पताल में पहुंचने पर उसे देखने वाला कोई नहीं था, या डाक्टर की गैर मौजूदगी में कंपाउण्डर ने उसका गलत इलाज कर दिया, या नर्स ने एक मरीज की दवा दूसरे मरीज को दे दी, या आपरेशन करते समय कोई औजार पेट में रह गया और पेट सी दिया गया, ये सब समाचार हो सकते हैं। इसी तरह कोई नवीनतम आपरेशन हो, जैसे हृदय परिवर्तन, वह भी समाचार का विषय है। हेडन के कोश के अनुसार – सब दिशाओं की घटनाओं को समाचार कहते हैं। वूत्सले और कैंपवेल का मानना है कि – समाचार किसी वर्तमान विचार, घटना का विवाद का ऐसा विवरण है जो उपभोक्ताओं को आकर्षित करे। हार्पर लीच और जान सी. कैरोल के अनुसार – समाचार अति गतिशील साहित्य है। समाचार पत्र समय के करघे पर इतिहास के बहुरंगे बेलबूटेदार कपड़े को बुनने वाले तकुए है। मैंसफील्ड का कहना है कि घटना समाचार नहीं है, बल्कि वह घटना का विवरण है, जिसे उनके लिये लिखा जाता है जिन्होंने उसे देखा नहीं है। के. पी. नारायणन के अनुसार – समाचार किसी सामयिक घटना का, महत्वपूर्ण तथ्यों का परिशुद्ध तथा निष्पक्ष विवरण होता है, जिससे उस समाचार पत्र में पाठकों की रुचि होती है जो इस विवरण को प्रकाशित करता है।
पत्रकार नंदकिशोर त्रिखा का कहना है कि – समाचार को सदैव नया, दिलचस्प, मनोरंजक और महत्वपूर्ण होना चाहिए। जेराल्ड डब्ल्यू. जानसन की राय में – समाचार वह है जिसे प्रस्तुत करते समय कर्ता का कोई आर्थिक लाभ तो न होता है, परंतु जिसके संपादन से ही उसकी व्यावसायिक कुशलता का पूरा – पूरा पता चलता हो। श्रेष्ठ समाचार की परिभाषा यद्यपि यही है, तथापि साधारण व्यवहार में समाचार वे हैं जो अखबार में छपते हैं और अखबार वे हैं जिन्हें समाचार पत्र में काम करने वाले पत्रकार तैयार करते हैं। नार्थ क्लिफ के अनुसार – समाचार सामान्य से परे की कोई बात है। मेरी मान्यता है कि हम जिस समाज अथवा राज्य, राष्ट्र में रहते हैं, उसके प्रशासक, नेता या अगुआ जो कहतदे – करते हैं, वह भी समाचार है। हमको प्रभावित करने वाले आर्थिक, राजनीतिक, आपराधिक, कानूनी, भौगोलिक आदि सभी विषयों की हलचलें समाचार हैं।
दूसरे शब्दों में, देश-विदेश में सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक आदि क्षेत्रों में घटित किसी सामयिक, विशिष्ट नवीन व महत्वपूर्ण घटना की रिपोर्ट या उससे संबंधित तथ्यों की निष्पक्ष, प्रमाणिक जानकारी, बहुसंख्यकों की अधिकतम रुचि हो, समाचार है।
समाचार क्यों?
समाचार क्या है? जान लेने के बाद इस बात पर विचार करना बहुत जरूरी है कि आखिर समाचार क्यों? वास्तव में हर व्यक्ति के भीतर कुछ नया जानने की ललक होती है। यह ललक जो पता है उससे कहीं अधिक पता लगाने की चेष्टा को जन्म देती है। व्यक्ति की इसी ललक और चेष्टा की पूर्ति का सबसे प्रमुख साधन बनते हैं समाचार। सच यह है कि समाचार का सीधा सम्बंध हर जन के जानने की ललक की पूर्ति से जुड़ा हुआ है। कहा यह भी जा सकता है कि किसी जनतांत्रिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिये हर जन के जानने के अधिकारों को सार्थक ढंग से अमल में लाने का काम समाचार ही करता है।
दूसरी ओर यदि जनतंत्र को जनता द्वारा, जनता के लिये, जनता का शासन मानें तो जरूरी है कि जनता द्वारा चुनी हुई सत्ता, जनता के जीवन संदर्भों यानी आजीविका और मौलिक अधिकारों के लिये क्या-क्या निर्णय ले रही है? इन निर्णयों पर किस-किस तरह अमल किया जा रहा है? अगर नहीं किया जा रहा है तो क्यों? आदि जिज्ञासाओं से जुड़ी सूचनाओं की जानकारी सामान्य् जन को होनी चाहिए। कम शब्दों में कहा जाए तो आम आदमी के जानने के अधिकार या यूं कहें सूचना की स्वतंत्रता अब के दिनों में जनतंत्र की पहली शर्त बन गयी है।
यह एक बहुत बड़ा सच है कि जिस देश की जनता को सही और विश्वसनीय सूचनाएं नहीं मिल पातीं, उस देश की जनता में हमेशा असुरक्षा की भावना घर कर जाती है। वास्तव में ऐसे देश के लोगों को पूरी तरह आजाद भी नहीं माना जा सकता।
पत्रकारिता के संदर्भ में जानने के अधिकार की बात को उठाते समय लोग यह प्रश्न जरूर उठाते हैं कि आखिर जानने का अधिकार क्यों? क्या ये अधिकार शासन-प्रशासन में फैले भ्रष्टाचार पर रोकथाम के लिये है? क्या ये अधिकार शासन-प्रशासन को देश के नागिरकों की जरूरतों, उनके अधिकारों व उनकी आजादी के प्रति अधिक जवाबदेह बनाने के लिये है? क्या ये अधिकार जनतंत्र की मजबूती के लिये जरूरी है? ऐसे ही कई और भी प्रश्न।
सच भी यह है कि जानने का अधिकार किसी देश व समाज के लोगों के मौलिक अधिकारों के बढकर है। यह भी कहा जा सकता है कि मौलिक अधिकारों को बचाने के लिये जानने के अधिकारों का होना बहुत जरूरी है। आज जबकि दिख रहा है सब कुछ की तर्ज पर बाजार पनप रहा है व सामाजिक ताना – बाना संवारा जा रहा है, तब यह और भी जरूरी हो जाता है कि जानने का अधिकार और अधिक मजबूत हो। इस जरूरत को पूरा करने में यदि कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं तो वे समाचार पत्र और चैनल ही हैं।
समाचार की पहचान
मनुष्य के आचार-व्यवहार, पसंद-नापसंद, रुचि-अभिरुचि आदि समाज, वातावरण, स्थिति, परिस्थिति और जरूरत के हिसाब से बदलते रहते हैं। उसकी पसंद बहुत ही व्यापक और परिवर्तनशील होती है, फिर भी उसकी एक पसंद ऐसी है, जो अपरिवर्तनीय, शाश्वत और अटल है। और वह है अपने आस-पास, देश-विदेश में घट रही घटनाओं के बारे में जानने की उसकी तीव्र इच्छा। मनुष्य की इस इच्छा को पूरा करने के माध्यम आधुनिक से आधुनिकतम होते रहे हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि उसकी यह इच्छा कम से कमचर होने की बजाय तीव्र से तीव्रतर होती जी रही है। आजकल मनुष्य की इस इच्छा को पूरा करने का प्रयास समाचार पत्र पूरे जोर-शोर से कर रहे हैं। कई प्रकार के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं जो राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक आदि कई विषयों को केन्द्र बिंदु बनाकर प्रकाशित होते हैं। इन सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों में बुनियादी तत्व मौजूद होते हैं, जो किसी भी समाचार को महत्व देने में विशेष योगदान देते हैं, जो पाठकों की सामान्य समाचार ग्राह्यता पर आधारित होते हैं और पाठकों की रुचि, आस्था, चेतना व स्वभाव को सीधे प्रभावित करते हैं तथा उसे बहुत गहरायी तक उद्वेलित कर कुछ करने के लिये प्रेरित करते हैं।
एक संवाददाता के लिये यह भी समझना बहुत जरूरी है कि समाचार पत्रों के पाठकों या समाचार चैनलों के दर्शक प्रत्येक दिन ऐसा कुछ पढना या देखना चाहते हैं, जो बीते हुए कल की अपेक्षा कुछ नया हो, उनकी रुचि के अनुरूप हो या वह सब कुछ बताने में समर्थ हो, जो उसके आस-पास के परिवेश में घट रहा है। संवाददाता जब तक अपने भीतर ऐसी क्षमता विकसित नहीं कर लेता कि समाचार की सही पहचान कर सके, तब तक वह अपने पाठकों या फिर दशर्कों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सकता।
समाचारों की सबही पहचान यानी न्यूज जजमेंट के लिये जरूरी है कि उन तत्वों को अच्छी तरह से समझ लिया जाए, जो किसी घटना, स्थिति, बयान, निर्णय, आदेश, व्यक्ति या उपलब्धि आदि को समाचार बनाते हैं। ये तत्व निम्नलिखित हैं-
१. प्रभाव
२. बात का वजन
३. विवाद
४. विषमता
५. नूतनता
६. सत्यता और यथार्थता
७. निकटता या समीपता
८. आत्मीयता
९. उपयोगिता
१०. विचित्रता
११. वैयक्तिकता
१२. एकात्मता
१३. सुरुचिपूर्णता
१४. परिवर्तनशीलता
१५. रहस्यपूर्णता
१६. महत्वशीलता
१७. भिन्नता
१८. संक्षिप्तता
१९. स्पष्टवादिता
२०. आकार और संख्या
२१. समीक्षात्मकता
२२. प्रतिफल
१. प्रभाव
संवाददाता को हमेशा यह ध्यान में रखना होता है कि कौन – कौन से समाचार उसके पाठक समूह या आम आदमी के बहुत बड़े हिस्से को प्रभावित कर सकते हैं या फिर उससे सीधे – सीधे जुड़े होते हैं। कओई बार एक ही समाचार में कई – कई बातें ऐसी होती हैं, जो आम आदमी को सीधे प्रभावित करती हैं या उनकी सीधा जुड़ाव होता है। ऐसी स्थितियों में यह देखना जरूरी हो जाता है कि कौन सी बात व्यापकता के साथ जनमानस के बहुत बड़े हिस्से को प्रभावित कर रही है। इसी बात को ऊपर रखकर समाचार की संरचना की जाती है।
उदाहरण के लिये नगर पालिका या नगर निगम की बैठक में सदस्यों द्वारा गृहकर बढाने और शहर में एक हर सुविधा से सुसज्जित अनाथालय बनाने का निर्णय लिया जाता है। मानवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखा जाए तो निश्चित ही अनाथालय बनाने का निर्णय महत्वपूर्ण लगता है और यह नगरवासियों के लिये एक नया समाचार भी हो सकती है, लेकिन गृहकर बढाने का निर्णय नगर के लगभग सभी निवासियों से जु़ड़ा है और उन्हें प्रभावित करने जा रहा है। इसलिये गृहकर बढने का समाचार प्रमुखता से देना होगा।
२. बात का वजन
समाचारों को प्रस्तुति देते समय यह देखना जरूरी हो जाता है कि किसी समाचार में कितना वजन है और वह उसकी तरह के अन्य समाचारों से किस तरह महत्वपूर्ण है। वजन की बात समझने के लिये संवाददाता को अपने विवेक का इस्तेमाल करना पड़ता है और यह विवेक उसके अनुभवों से प्रभावित होता है।
उदाहरण के लिये हत्याओं के समाचार में लूट के समाचार से अधिक वजन है और लूट के समाचार में छीना-झपटी के समाचार से अधिक वजन है। कई बार समाचारों का वजन इस आधार पर तय करना पड़ता है कि वह समाचार, जिस क्षेत्र में प्रकाशित या प्रसारित हो रहा है, उस क्षेत्र का सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक और आपराधिक ताना-बाना किस प्रकार का रहा है और रहेगा। स्थानीयता के आधार पर समाचारों को प्रस्तुत करके अपने समाचार पत्र या चैनल के लिये अधिक से अधिक पाठक व दर्शक तैयार किये जा सकते हैं।
३. विवाद
विवाद समाचारों का बहुत ही प्रिय शब्द रहा है। यदि किसी समाचार पत्र या चैनल पर प्रस्तुत होने वाले समाचारों पर ध्यान दें तो अधिकांश समाचार विवादों से उपजते दिखेंगे, विवाद लिये हुए होंगे या फिर विवाद को जन्म देते लगेंगे। आरोप – प्रत्यारोप, आंदोलन-समझौता, शिकायत-कार्यवाही, जांच-कार्रवाई, बैठक-बहिष्कार आदि सभी किसी न किसी विवाद से जुड़े होते हैं और समाचार को जन्म देते हैं। ऐसे समाचारों को प्रस्तुत करना इसलिये भी जरूरी रहता है कि इनसे समाज के कई वर्गों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ाव होता है।
४. विषमता
चार्ल्स डाना ने १८८२ में समाचार को परिभाषित करते हुए कहा था कि आदमी को कुत्ता काट ले तो यह सामान्य सी बात है, समाचार तो तब बनता है, जब आदमी कुत्ते को काट ले। कई मझे हुए पत्रकरों की धारणा रहती है कि जनता हैरान होने या चौंकने का पूरा आनन्द उठाती है। इसलिये कहीं कोई विषमता या फिर असामान्य दिखाई दे, तो उसे समाचार बनाने से नहीं चूकना चाहिए। संवाददाता अगर विषमताओं और असमान्य की खोज पर निकले तो उसे कुछ न कुछ मिल ही जाता है।
उदाहरण के लिये थानेदार के यहां चोरी का समाचार, जनता द्वारा शराबी पुलिस की जमकर धुनाई का समाचार, बहू द्वारा सास को जला डालने का समाचार, परीक्षा देते समय ही प्रसव पीड़ा उठने और बच्चा पैदा होने का समाचार, पुलिस संरक्षण में महिला से बलात्कार का समाचार आदि। वास्तव में समाज के हर पहलू से जुड़े तरह-तरह के विषयों में ऐसी विषमताएं मिल ही जाती हैं, जो समाचार का रूप ले सकती हैं। आवश्यकता है उन्हें परखने की क्षमता विकसित करने की।
५. नूतनता
पाठकों को असाधारण, नवीन, ताजा से ताजा समाचार आकर्षित करते हैं। समाचार प्रस्तुत करने में विलंब होने पर वे निस्तेज और निरर्थक हो जाते हैं। यही कारण है कि आकस्मिक रूप से घटित घटनाओं के समाचारों को समाचार पत्रों में अर्ध विकसित रूप में ही तुरंत ही दे दिया जाता है और बाद में समाचार संकलित कर उसे विकसित रूप में दिया जाता है।
६. सत्यता और यथार्थता
किसी घटना के यथार्थ, वास्तव्य और सत्य पर आधारित विश्लेषण, परीक्षण एवं पूर्वाग्रह या पक्षपातरहित परिशुद्ध एवं संतुलित विवरणों में स्पष्टता होती है, जो समाचार को मूल्यवान बनाती है और इन विवरणों पर दृढता, अटलता, दृढ प्रतिज्ञता और निश्चयात्मकता, जो समाज के हित में होती है, समाचार पत्र के हित अर्थात उसकी खपत बढाने में भी सहायक होती है।
७. निकटता या समीपता
पाठक के लिये निकटस्थ छोटी से छोटी घटना दूर बड़ी घटना से अधिक महत्वपूर्ण होती है। आत्मीय लगाव व अपनेपन के कारण वह अपनी निकटवर्ती या घनिष्ठ व्यक्ति, स्थान आदि से सम्बंधित घटना में अधिक रुचि लेता है, इसलिये जिस स्थान का समाचार दिया जा रहा हो और जिस स्थान पर समाचार पत्र प्रकाशित हो रहा हो उसमें भौगोलिक निकटता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
८. आत्मीयता
आत्मीयता अंतस्थ सहानुभूति को खोलती है और पाठकों को समाचारों से जोड़ती है। मानवीय गुणों जैसे – प्रेम, ईर्ष्या, दया, सहानुभूति, त्याग, भय, आतंक, घृणा, हर्ष से संबंधित समाचार आत्मीय होने के कारण पाठकों को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं।
९. उपयोगिता
जन-सामान्य के रहन – सहन, उनकी दिनचर्या, जीवनचर्या, लोक-व्यवहार, उद्योग व्यवसाय में आवश्यक, लाभदायक, सहयोगी व उपयोगी सभी सूचनाएं व जानकारियां समाचार पत्र की उपयोगिता को बढाती हैं, जो कि पाठकों को समाचार पत्र खरीदने के लिये बाध्य करती हैं।
१०. विचित्रता
मनुष्य की वृत्ति सदा ही जिज्ञासु रही है। संशय और रहस्य से पूर्ण समाचार पाठकों को आकर्षित करने के साथ उनकी जिज्ञासा को भी शांत करते हैं।
समाचार के साथ समाचार प्रस्तुत करने का अनोखापन, सुंदर ढंग पाठकों का मनोरंजन करने के साथ असाधारण सौंदर्यानुभूति व आनंदानुभूति कराते हैं।
११. वैयक्तिकता
आम और खास व्यक्ति के आधार पर समाचार भी विशेष और गौण महत्व रखते हैं। किसी विशेष व्यक्ति द्वारा किया गया साधारण काम और किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा किया गया विशेष काम या अप्रत्याशित उपलब्धि समाचार बन जाती है। इन समाचारों में साधारण – विशेष, अमीर – गरीब, छोटे-बड़े सभी पाठक अपना बिम्ब देखते हैं, इसीलिये इसे समाचार तत्व प्राप्त होता है।
१२. एकात्मता
एकता, अखण्डता, समानता, अभिन्नता हमारे देश, समाज और समुदाय की आत्मा है। ये हमारे आदर्श व जीवनमूल्य हैं। ये हमारे मन में एकत्व का भाव जगाते हैं। इनका अनुभव भौगोलिक सीमा के बाहर भी होता है इसलिये समाचार पत्रों में देश, समाज व धर्म से जुड़े इन आधारों को भी महत्व दिया जाता है।
१३. सुरुचिपूर्णता
पाठकों की रुचि को प्रभावित करने वाले समाचार अधिक पठनीय होते हैं। प्रत्येक पाठक की समाचार में रुचि उसकी शिक्षा, सामाजिक वातावरण, समाज में स्थिति, उद्योग-व्यवसाय, उम्र आदि पर निर्भर करती है। फिर भी, आम चुनाव, प्राकृतिक आपदा, वैज्ञानिक अविष्कार, दंगे, खेल आदि से संबंधित समाचारों में सभी की रुचि होती है।
१४. परिवर्तनशीलता
मनुष्य परिवर्तनशील प्राणी है। उसकी इच्छा-अनिच्छा, पसंद-नापसंद, रुचि-अभिरुचि सदा परिवर्तित होती रहती है। इस कारण समाज या व्यक्ति के कार्य में भी परिवर्तन होता रहता है। यही कारण है कि सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आदि परिवर्तनों के सामयिक समाचार पाठकों का ध्यान खींचते हैं।
१५. रहस्यपूर्णता
मानवजीवन रहस्यों के पूर्ण है। मानव स्वाभाव है कि उसके मन में हर पल, क्या, कहां, क्यों, कब, कैसे, किसने जैसे प्रश्न उठते रहते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर के साथ गुप्त भेदों, गोपनीय विषयों के राज खुलते जाते हैं और पाठक को मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती है।
१६. महत्वशीलता
यदि किसी घटना का परिणाम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यापारिक, साहित्यिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में बहुत बड़ा परिवर्तन लाने वाला हो तब भी वह समाचार पाठकों के लिये अधिक महत्वपूर्ण होता है।
१७. भिन्नता
बहुधा एक ही तरह के समाचार एकरूपता के कारण पाठक को आकर्षित नहीं कर पाते। भिन्न – भिन्न तरह के तथा अलग – अलग ढंग से प्रस्तुत समाचार पाठकों को अधिक आकर्षित और प्रभावित करते हैं।
१८. संक्षिप्तता
आज की जिंदगी भाग-दौड़ की और तेज जिंदगी है। आज हर व्यक्ति अपने में, अपनी जिंदगी में और अपने घर-परिवार में व्यस्त है। उसके पास बड़े – बड़े व लम्बे समाचारों को पढने के लिये अतिरिक्त या खाली समय नहीं है इसलिये उचित, आवश्यक व योग्य समाचारों के साथ ही सरल, सुंदर, सही, लचीली, धारदार, रोचक भाषा शैली में दिये गये समाचारों का अपना महत्व होता है, जो कि समाचार का एक मुख्य तत्व है।
१९. स्पष्टवादिता
तथ्यों व जानकारियों के साथ विचारों और प्रस्तुतिकरण में स्पष्टवादिता का भी विशेष महत्व होता है, क्योंकि स्पष्टवादिता ही पाठकों में समाचारों के प्रति विश्वास पैदा करती है।
२०. आकार और संख्या
आकार और संख्या के आधार पर भी किसी घटना का समाचार मूल्य आंका जाता है। विमान या रेल दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा-बाढ, अकाल, महामारी आदि तथा दंगे में अधिक संख्या में मृत और घायल यात्रियों, लोगों से सम्बद्ध समाचारों को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि कम लोगों या यात्रियों की मौत के समाचार समाचार की दृष्टि से अपेक्षतया गौण होते हैं।
२१. समीक्षात्मकता
समाचार समीक्षा करने योग्य या समीक्ष्य हों तो पाठकों को उसका ठीक-ठीक मूल्यांकन करने, दृढता से प्रमाणित करने तथा अपनी राय या सम्मति प्रकट करने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि समीक्षात्मकता समाचार का आवश्यक तत्व है।
२२. प्रतिफल
संवाददाता की यह जिम्मेदारी होती है कि वह पिछली घटनाओं, भुक्तभोगियों व विषय विशेषज्ञों की राय और अपने आकलन का सहारा लेकर अपने पाठकों व दर्शकों को किसी सूचना, स्थिति या घटना के प्रभाव, परिणाम या प्रतिफल के प्रति भी सचेत करता चले। सच्चाई यह है कि हर कोई यह जानना चाहता है कि अब क्या होगा? इससे क्या प्रभाव पड़ेगा? इससे बचा कैसे जाए? आदि – आदि। इसलिये लोगोंके साथ अपने समाचार पत्र या चैनल का सीधा सम्बंध बनाने के लिये यह जरूरी है कि संवाददाता सूचनाओं, स्थितियों व घटनाओं का विधिवत आकलन करे और विश्वसनीय तरीके से लोगों को आगे आने वाले समय के लिये जागरुक करे।
अंत में
समाचारों की पहचान में स्थानीयता का पुट होना बहुत जरूरी है। यह तय होना जरूरी है कि इस समाचार के पाठक या दर्शक किस परिवेश, किस भाषा, किस संस्कृति और किस रुचि के हैं। यदि इन चार जरूरी स्थानीय तत्वों को नजरअंदाज कर दिया गया तो यह निश्चित है कि समाचार और समाचार प्रस्तुत करने वाला संवाददाता अपने पाठकों और दर्शकों के बीच पैठ नहीं बना सकेगा। यह न केवल समाचार पत्र चैनल के लिये बल्कि समाचार एकत्र करने वाले संवाददाताओं के लिये घातक होता है। बहुत बार देखा जाता है कि जिस संवाददाता की पैठ अपने पाठकों और दर्शकों के बीच होती है, उसे समाचारों का टोटा कभी नहीं होता है। ऐसा इसलिये होता है कि उसके पाठक या दर्शक स्वयं में उसमें प्रचारक, प्रसारक व पोषक की तरह काम करने लगते हैं।
आन डिमांड सर्विस के इस समय में किसी संवाददाता के लिये यह जान लेना जरूरी होता है कि उसे जिस क्षेत्र में कार्य करना है, वहां के लोगों का परिवेश, संस्कृति, भाषा और रुचि किस तरह की है। इन चार स्थानीय तत्वों को जान लेने के बाद यह समझ लेना आसान हो जाता है कि जिस क्षेत्र में संवाददाता को काम करना है, वहां के लोगों की समाचारों से कैसी आशायें हैं यानी उनकी न्यूज डिमांड क्या है।

समाचार के प्रकार


समाचार के प्रकार

बदलती दुनिया, बदलते सामाजिक परिदृश्य, बदलते बाजार, बाजार के आधार पर बदलते शैक्षिक-सांस्कृतिक परिवेश और सूचनाओं के अम्बार ने समाचारों को कई – कई प्रकार दे डाले हैं। कभी उंगलियों पर गिन लिये जाने वाले समाचार के प्रकारों को अब पूरी तरह गिना पाना संभव नहीं है। एक बहुत बड़ा सच यह है कि इस समय सूचनाओं का एक बहुत बड़ा बाजार विकसित हो चुका है। इस नये – नवेले बाजार में समाचार उत्पाद का रूप लेते जा रहे हैं। समाचार पत्र हों या चैनल, हर ओर समाचारों को ब्रांडेड उत्पाद बनाकर परोसने की कवायद शुरू हो चुकी है। खास और एक्सक्लूसिव बताकर समाचार को पाठकों या दर्शकों तक पहुंचाने की होड़ ठीक उसी तरह है, जिस तरह किसी कम्पनी द्वारा अपने उत्पाद को अधिक से अधिक उपभोक्ताओं तक पहुंचाना।
समाचारों का मार्केट तैयार करने की बात बड़ी तेजी से सामने आ रही है। कुछ नया करके आगे निकल जाने की होड़ में लगभग सभी समाचार पत्र और चैनल शामिल हैं। यही वजह है कि बीसवीं सदी के अंतिम दशक से समाचारों के प्रकारों की फेहरिस्त लगातार बढती नजर आ रही है। इंटरनेट के प्रयोग ने इस फेहरिस्त को लम्बा करने और सम्यक व अद्यतन जानकारियों से लैस करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सच तो यह है कि इंटरनेट ने भारत के समाचार पत्रों को विश्व स्तर के समाचार पत्रों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। सर्वाधिक गुणात्मक सुधार व विकास हिन्दी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में देखने को मिला है।
समाचार के कई प्रकार हैं। घटना के महत्व, अपेक्षितता, अनपेक्षितता, विषय क्षेत्र, समाचार का महत्व, संपादन हेतु प्राप्त समाचार, प्रकाशन स्थान, समाचार प्रस्तुत करने का ढंग आदि कई आधारों पर समाचारों का विभाजन, महत्ता व गौणता का अंकन किया जाता है। तथा उसके आधार पर समाचारों का प्रकाशन कर उसे पूर्ण, महत्वपूर्ण व सामयिक बनाया जा सकता है।
क. प्रकाशन स्थान के आधार पर
१. स्थानीय समाचार
गांव या कस्बे, जहां से समाचार पत्र का प्रकाशन होता हो, विद्यालय या अस्पताल की इमारत का निर्माण, स्थानीय दंगे, दो गुटों में संघर्ष जैसे स्थानीय समाचार, जो कि स्थानीय महत्व और क्षेत्रीय समाचार पत्रों की लोकप्रियता को बढाने में सहायक होने के कारण स्थानीय समाचार पत्रों में विशेष स्थान पाते हों, स्थानीय समाचार कहलाते हैं। समाचार यदि लोगों से सीधे जुड़े होते हैं तो उसकी प्रसार व प्रचार की स्थिति बहुत अधिक मजबूत हो जाती है। इधर कई समाचार पत्रों ने अपने स्थानीय संस्करण प्रकाशित करने शुरू कर दिये हैं। ऐसे में दो से सात पृष्ठ स्थानीय समाचारों से भरे जा रहे हैं। यह कवायद स्थानीय बाजार में अपनी पैठ बनाने की भी है, ताकि स्थानीय छोटे – छोटे विज्ञापन भी आसानी से प्राप्त किये जा सकें। स्थानीय समाचार में जन सहभागिता भी सुनिश्चित की जाती है, ताकि समाचार पत्र को लेग अपनी ही आवाज का प्रतिरूप मान सकें। कई समाचार पत्रों ने अपने स्थानीय कार्यालय या ब्यूरो स्थापित कर दिये हैं और वहां संवाददाताओं की कई स्तरों वाली फौज भी तैनात कर रखी है।
समाचार चैनलों में भी स्थानीयता को महत्व दिया जाने लगा है। कई समाचार चैनल समाचार पत्रों की ही तरह अपने समाचारों को स्थानीय स्तर पर तैयार करके प्रसारित कर रहे हैं। वे छोटे – छोटे आयोजन या घटनाक्रम, जो समाचारों के राष्ट्रीय चैनल पर बमुश्किल स्थान पाते थे, अब सरलता से टीवी स्क्रीन पर प्रसारित होते दिख जाते हैं। कुछ शहरों में स्थानीय केबल समाचार चैनल भी शुरु हो गये हैं, और बहुत लोकप्रिय सिद्ध हो रहे हैं। यह कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में स्थानीय स्तर पर समाचार चैनल संचालित करने की होड़ मचने वाली है।
२. प्रादेशिक या क्षेत्रीय समाचार
जैसे – जैसे समाचार पत्र व चैनलों का दायरा बढता जा रहा है, वैसे – वैसे प्रादेशिक व क्षेत्रीय समाचारों का महत्व भी बढ रहा है। एक समय था कि समाचार पत्रों के राष्ट्रीय संस्करण ही प्रकाशित हुआ करते थे। धीरे – धीरे प्रांतीय संस्करण निकलने लगे और अब क्षेत्रीय व स्थानीय संस्करण निकाले जा रहे हैं।
किसी प्रदेश के समाचार पत्रों पर ध्यान दें तो उसके मुख्य पृष्ठ पर प्रांतीय समाचारों की अधिकता रहती है। प्रांतीय समाचारों के लिये प्रदेश शीर्षक से पृष्ठ भी प्रकाशित किये जाते हैं। इसी तरह से पश्चिमांचल, पूर्वांचल या फिर बुंदेलभूमि शीर्षक से पृष्ठ तैयार करके क्षेत्रीय समाचारों को प्रकाशित किया जाने लगा है। प्रदेश व क्षेत्रीय स्तर के ऐसे समाचारों को प्रमुखता से प्रकाशित करना आवश्यक होता है, जो उस प्रदेश व क्षेत्र की अधिसंख्य जनता को प्रभावित करते हों। कुछ समाचार चैनलों ने भी क्षेत्रीय व प्रादेशिक समाचारों को अलग से प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है।
३. राष्ट्रीय समाचार
देश में हो रहे आम चुनाव, रेल या विमान दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा – बाढ, अकाल, महामारी, भूकम्प आदि – रेल बजट, वित्तीय बजट से सम्बंधित समाचार, जिनका प्रभाव अखिल देशीय हो, राष्ट्रीय समाचार कहलाते हैं। राष्ट्रीय समाचार स्थानीय और प्रांतीय समाचार पत्रों में भी विशेष स्थान पाते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर घट रही हर घटना – दुर्घटना समाचार पत्रों व चैनलों पर महत्वपूर्ण स्थान पाती है। देश के दूर-दराज इलाके में रहने वाला सामान्य सा आदमी भी यह जानना चाहता है कि राष्ट्रीय राजनीति कौन सी करवट ले रही है, केन्द्र सरकार का कौन सा फैसला उसके जीवन को प्रभावित करने जा रहा है, देश के किसी भी कोने में घटने वाली हर वह घटना जो उसके जैसे करोड़ों को हिलाकर रख देगी या उसके जैसे करोड़ों लोगों की जानकारी में आना जरूरी है।
सच यह है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रचार – प्रसार ने लोगों को समाचारों के प्रति अत्यधिक जागरुक बनाया है। पल प्रति पल घटने वाली हर बात को जानने की ललक ने कुछ और – कुछ और प्रस्तुत करने की होड़ को बढावा दिया है। सच यह भी है कि लोगों में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करने की ललक ने समाचार पत्रों की संख्या में तेजी से वृद्धि की है। एक तरफ इलेक्ट्रानिक मी़डिया से मिली छोटी सी खबर को विस्तार से पढाने की होड़ में शामिल समाचार पत्रों का रंग – रूप बदलता गया, वहीं समाचार चैनलों की शुरूआत करके इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपने दर्शकों को खिसकर जाने से रोकने की कवायद शुरू कर दी। हाल यह है कि किसी भी राष्ट्रीय महत्व की घटना-दुर्घटना या फिर समाचार बनने लायक बात को कोई भी छोड़ देने को तैयार नहीं है, न इलेक्ट्रानिक मीडिया और न ही प्रिंट मीडिया। यही वजह है कि समाचार चैनल जहां राष्ट्रीय समाचारों को अलग से प्रस्तुत करने की कवायद में शामिल हो चुके हैं, वहीं बहुतेरे समाचार पत्र मुख्य व अंतिम कवर पृष्ठ के अतिरिक्त राष्ट्रीय समाचारों के दो-तीन पृष्ठ अलग से प्रकाशित कर रहे हैं।
४. अंतर्राष्ट्रीय समाचार
ग्लोबल गांव की कल्पना को साकार कर देने वाली सूचना क्रांति के बाद के इस समय में अंतर्राष्ट्रीय समाचारों को प्रकाशित या प्रसारित करना जरूरी हो गया है। साधारण सा साधारण पाठक या दर्शक भी यह जानना चाहता है कि अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव का परिणाम क्या रहा या फिर हालीवुड में इस माह कौन सी फिल्म रिलीज होने जा रही है या फिर आतंकवादी सरगना बिन लादेन कहां छिपा हुआ है। विश्व भर के रोचक – रोमांचक को जानने के लिये अब हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के पाठकों और दर्शकों में ललक बढी है। यही कारण है कि यदि समाचार चैनल दुनिया एक नजर में या फिर अंतर्राष्ट्रीय समाचार प्रसारित कर रहे हैं तो हिन्दी के प्रमुख अखबारों ने अराउण्ड द वर्ल्ड, देश विदेश, दुनिया आदि के शीर्षक से पूरा पृष्ठ देना शुरू कर दिया है। समाचार पत्रों व चैनलों के प्रमुख समाचारों की फेहरिस्त में कोई न कोई महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समाचार रहता ही है।
कई चैनलों व समाचार पत्रों ने विश्व के कई प्रमुख शहरों में, खासकर राजधानियों में, अपने संवाददाताओं को नियुक्त कर रखा है। समाचार पत्रों के विदेशी समाचार वाले पृष्ठ को छायाचित्रों सहित इंटरनेट से तैयार किया जाता है। बहुतेरे समाचार विदेशी समाचार एजेंसियों से प्राप्त किये जाते हैं। कई फ्री-लांसिंग करने वाले यानी स्वतंत्र पत्रकारों व छायाकारों ने अपनी व्यक्तिगत वेबसाइट बना रखी है, जो लगातार अद्यतन समाचार व छायाचित्र उपलब्ध कराते रहते हैं। इंटरनेट पर तैरती ये वेबसाइटें कई मायनों में अति महत्वपूर्ण होती है। सच यह है कि जैसे – जैसे देश में साक्षरता बढ रही है, वैसे – वैसे अधिक से अधिक लोगों में विश्व भर को अपनी जानकारी के दायरे में लाने की होड़ मच गई है। यही वजह है कि समाचार से जुड़ा व्यवसाय अब अंतर्राष्ट्रीय समाचारों को अधिक से अधिक आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करने की होड़ में शामिल हो गया है।
ख. विषय विशेष के आधार पर
निरंतर बदलती दुनिया ने समाचारों के लिये विषयों की भरमार कर दी है। पहले जहां मात्र राजनीति के समाचार, अपराध के समाचार, खेल-कूद के समाचार, साहित्य-संस्कृति के समाचार से ही समाचार पत्रों का काम चल जाया करता था, वहीं अब सूचना क्रांति, बदलते शैक्षिक परिवेश और बदलते सामाजिक ताने-बाने ने समाचारों के लिये ढेरों विषय पैदा कर दिये हैं। देश में बढ रही साक्षरता व जागरुकता ने भी समाचारों के वैविध्य को बढा दिया है। अब कोई भी समाचार पत्र या चैनल समाचारों के वैविध्य को अपनाये बिना चल ही नहीं सकता। मल्टीप्लेक्स और मल्टी टेस्ट रैस्त्रां के इस समय में पाठक-दर्शक वह सब कुछ पढना-सुनना-देखना चाहता है, जो उसके इर्द-गिर्द घट रहा है। उसे हर उस विषय से जुड़ी ताजा जानकारी चाहिए, जो सीधे या फिर परोक्ष रूप से उससे जुड़ी हुई है। जमाना मांग और आपूर्ति के बीच सही तालमेल बैठाकर चलने का है और यही वजह है कि कोई भी समाचार पत्र या चैनल ऐसा कुछ भी छोड़ने को तैयार नहीं है, जो उसके पाठक या दर्शक की पसंद हो सकती है। दिख रहा है सब कुछ के इस समय में वे विषय भी समाचार बन रहे हैं, जिनकी चर्चा सभ्य समाज में करना वर्जित माना जाता रहा है।
विषय विशेष के आधार पर हम समाचारों को निम्नलिखत प्रकारों में विभेदित कर सकते हैं -
(१) राजनीतिक समाचार
(२) अपराध समाचार
(३) साहित्यिक-सांस्कृतिक समाचार
(४) खेल-कूद समाचार
(५) विधि समाचार
(६) विकास समाचार
(७) जन समस्यात्मक समाचार
(८) शैक्षिक समाचार
(९) आर्थिक समाचार
(१०) स्वास्थ्य समाचार
(११) विज्ञापन समाचार
(१२) पर्यावरण समाचार
(१३) फिल्म-टेलीविजन (मनोरंजन) समाचार
(१४) फैशन समाचार
(१५) सेक्स समाचार
(१६) खोजी समाचार . . . आदि।
(१) राजनीतिक समाचार
समाचार पत्रों में सबसे अधिक पढे जाने वाले और चैनलों पर सर्वाधिक देखे-सुने जाने वाले समाचार राजनीति से जुड़े होते हैं। राजनीति की उठा-पटक, लटके-झटके, आरोप – प्रत्यरोप, रोचक-रोमांचक, झूठ-सच, आना-जाना, आदि से जुड़े समाचार सुर्खियों में होते हैं। भारत जैसे देश में, जहां का आम आदमी साल के ३६५ दिनों में से लगभग दो दिन वोटर के रूप में बर्ताव करता है, राजनीति से जुड़े समाचारों का पूरा का पूरा बाजार विकसित हो चुका है। इस राजनीतिक समाचारों के बाजार में समाचार पत्र और समाचार चैनल अपने उपभोक्ताओं को रिझाने के लिये नित नये प्रयोग करते नजर आ रहे हैं। चुनाव के मौसम में इन प्रयोगों की झड़ी लग जाती है और हर कोई एक दूसरे को पछाड़ कर आगे निकल जाने की होड़ में शामिल हो जाता है।
राजनीतिक समाचारों के बाजार में अपनी पैठ को मजबूत करने और उपभोक्ताओं को चटपटे उत्पाद देने की जुगत में समाचार पत्रों व चैनलों ने राजनीतिक पार्टियों के लिये अलग – अलग संवाददाता नियुक्त कर रखे हैं। राजनीतिक पार्टियां अब बहुत सचेत हो चुकी हैं और अब मात्र पार्टी प्रवक्ता नियुक्त करके या फिर मीडिया प्रकोष्ठ स्थापित करके काम नहीं चलाया जाता, बल्कि सुव्यवस्थित ढंग से मीडिया मैनेजमेंट कोर स्थापित किये जा रहे हैं। सूचना क्रांति के बाद घटी इस घटना को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए कि सन् २००४ के आम चुनावों में कुछ पार्टियों ने देश भर से अपने पार्टी प्रवक्ताओं और मीडिया प्रभारियों को बुलाकर विधिवत प्रशिक्षण दिया कि किस तरह वे समाचार पत्रों और चैनलों को मैनेज करें और मीडिया फ्रैंडली नजर आयें।
सच्चाई यह है कि किसी भी लोकसभा – विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी समाचार पत्रों व चैनलों में अधिक से अधिक प्रचार पाना चाहते हैं और इसके लिये वे तरह – तरह से स्थानीय संवाददाताओं को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। कभी अपनी जाति-धर्म-रिश्ते-क्षेत्र का हवाला देकर तो कभी धन का प्रलोभन व धमकियों का डर बैठाकर। ऐसे में जो समाचार पत्र या चैनल लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय होते हैं, उन पर दवाब अधिक होता है। यही वजह है कि इनसे जुड़े संवाददाताओं के सामने यह चुनौती होती है कि वे किस तरह अपनी व अपने संस्थान की शुचिता और निष्पक्षता को बचाये रख सकें।
राजनीतिक समाचारों की प्रस्तुति में पहले से अधिक बेबाकी आयी है। रोचक ढंग से राजनीति पर मार करने की रणनीति को लोगों द्वारा सराहा भी जा रहा है। सच यह है कि अपने देश में लोकतंत्र की दुहाई के साथ जीवन के लगभग हर क्षेत्र में राजनीति की दखल बढा है और इसी कारण राजनीतिक समाचारों की भी संख्या बढी है। ऐसे में इन समाचारों को नजरअंदाज कर जाना संभव नहीं है। राजनीतिक समाचारों की आकर्षक प्रस्तुति लोकप्रियता हासिल करने का बहुत बड़ा साधन बन चुकी है।
२. अपराध समाचार
राजनीतिक समाचारों के बाद अपराध समाचार ही महत्वपूर्ण होते हैं। बहुतेरे पाठकों व दर्शकों को अपराध समाचार जानने की भूख होती है। इसी भूख को शांत करने के लिये ही समाचार पत्रों में अपराध डायरी व चैनलों पर सनसनी, वारदात, क्राइम फाइल जैसे समाचार कार्यक्रम प्रकाशित-प्रसारित किये जा रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार किसी समाचार पत्र में लगभग पैंतीस प्रतिशत समाचार अपराध से जुड़े होते हैं। सच तो यह है कि अपराध के समाचार सामने आ जाने के बाद कुछ महत्वपूर्ण समाचारों को छोड़कर सभी बेमानी लगने लगते हैं।
हर संवाददाता के लिये यह समझना जरूरी है कि अपराधिक घटनाओं का सीधा सम्बंध व्यक्ति, समाज, सम्प्रदाय, समुदाय, धर्म और देश से होता है। अपराधिक घटनाओं का प्रभाव यदि व्यापक होता है तो यह जरूरी हो जाता है कि एक बड़े पाठक-दर्शक वर्ग का ख्याल रखा जाये तथा घटना से जुड़ी हर संभावित खबर, फोटो और खबर के पीछे की खबर को प्रकाशित व प्रसारित किया जाए। ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपराधिक समाचारों को संकलित, लिखते या प्रकाशित-प्रसारित करते समय उसकी कानूनी प्रक्रिया और सामाजिक पहलुओं की सारी जानकारी प्राप्त की जाए। संवाददाता की विश्वसनीयता का भी पूरा का पूरा ख्याल रखा जाये। वास्तव में अपराध समाचार लिखते समय अपनी जवाब-देही व उत्तरदायित्वों का पूरा का पूरा ख्याल करना जरूरी होता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि अपराध संवाददाता बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि जिसे यह जिम्मेदारी सौंपी जा रही है, उसे पत्रकारिता के हर पहलू की जिम्मेदारी है भी या नहीं।
३. साहित्यिक-सांस्कृतिक समाचार
समाचार पत्रों व चैनलों पर सांस्कृतिक, साहित्यिक समाचारों का चलन बढा है। यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन है कि हिन्दी के समाचार चैनलों ने साहित्य व संस्कृति के समाचारों को न केवल प्रमुखता से देना शुरू किया है, बल्कि साहित्य व संस्कृति के कुछ विशेष समाचार कार्यक्रम ठीक उसी तर्ज पर शुरु किये हैं, जैसा कि समाचार पत्र अपने यहां नियमित साहित्यिक व सांस्कृतिक कालम के रूप में करते आये हैं। एक अध्ययन के अनुसार दर्शकों के एक वर्ग ने अपराध व राजनीति के समाचार कार्यक्रमों से कहीं अधिक अपनी संस्कृति से जुड़े समाचारों व समाचार कार्यक्रमों से जुड़ना पसंद किया है।
समाचार पत्रों ने भले ही व्यंग्य के नियमित कालमों को अब लगभग बंद कर दिया हो, लेकिन साहित्य-संस्कृति के नियमित पृष्ठ दिया जाना नहीं रुका है। इधर कई समाचार पत्रों ने अभियान चला कर दूर-दराज के इलाकों की साहित्यिक व सांस्कृतिक विभूतियों व धराहरों को सामने लाने का अभिनव प्रयास किया और यह पाठकों द्वारा सराहा भी गया है। यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि कई समाचार पत्रों ने साहित्यिक-सांस्कृतिक संवाददाता रखने और इन्हीं विषयों से जुड़ी डेस्क बनाने की पहल की है। वास्तव में यह कवायद करनी इसलिये भी जरूरी हो गयी है कि साहित्य व संस्कृति पर उपभोक्तावादी संस्कृति व बाजार का प्रहार दिखाकर केन्द्र व प्रदेश की सरकारें बहुत बड़ा बजट इन्हें संरक्षित करने व प्रचारित-प्रसारित करने में खर्च कर रही हैं। साहित्य व संस्कृति के नाम पर चलने वाली बड़ी – बड़ी साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाएं आयोजनों, प्रकाशन व पुरस्कारों के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं। ये संस्थाएं सरकारी, अर्धसरकारी व निजी यानी सभी तरह की हैं।
यही नहीं, साहित्य व संस्कृति के नाम पर विवादों के बढने की घटनाएं बढी हैं। वाद – प्रतिवाद, आरोप – प्रत्यारोप और गुटबाजी ने साहित्य – संस्कृति में मसाला समाचारों की संभावनाओं को बहुत बढाया है। साहित्यिक, सांस्कृतिक उठा-पटक को मिर्च-मसाला लगाकर समाचार के रूप में प्रस्तुत करने का चलन बढा है। इस चलन को स्वीकारने वालों की फौज भी तैयार हो गई है। इसीलिये समाचार पत्र, चैनल व पत्रिकायें इन विषयों को छोडकर स्वयं के होने की कल्पना करना ही नहीं चाहते।
४. खेल-कूद समाचार
पाठकों व दर्शकों की एक बहुत बड़ी संख्या खेल समाचारों को पढना, देखना, सुनना चाहती है। हर समाचार संस्थान में खेल संवाददाताओं और खेल डेस्क होना निश्चित है। बहुत से संस्थान के खेल संवाददाता व खेल सम्पादक के रूप में ऐसे ही लोगों की नियुक्ति करते हैं, जो खिला़ड़ी भी हों या पूर्व में रहे हों।
वास्तव में प्रत्येक खेल के अपने तकनीकी शब्द होते हैं और एक निश्चित भाषा भी। खेल के जानकार लोगों को किसी समाचार पत्र व चैनल से यह अपेक्षा होती है कि वह खेल की ताजा व मुकम्मल खबर दे। रोचक – रोमांचक ढंग से खेल समाचारों की प्रस्तुति देते समय इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि खेल शब्दावली का अतिशय प्रयोग करके समाचार को बोझिल न बना दिया जाए। निहायत अजनबी खेल शब्द का प्रयोग करते समय एक बार उसका सामान्य बोलचाल में अर्थ दे देना उचित होता है।
खेल समाचारों के लिये आंकड़े व रिकार्ड प्राण की तरह होते हैं। खेलों की दुनिया में लगातार आंकड़े और रिकार्ड जुड़ते रहते हैं। इसलिये जरूरी है कि खेल संवाददाता व खेल सम्पादक के पास अपनी एक ऐसी कम्प्यूटर फाइल हो, जिसमें आंकड़ों व रिकार्डों को निरंतर दर्ज किया जाता रहे। एक सच यह भी है कि आंकड़े जहां एक तरफ किसी समाचार को रोचक बनाते हैं वहीं अधिकता में बोझिल भी बना देते हैं। आंकड़ों को यदि समाचार के साथ विशेष रूप से पृष्ठ सज्जा के अनुसार प्रस्तुत किया जाए तो अच्छा होता है। खेल समाचारों को यदि रनिंग कमेंट्री यानी आंखों देखा हाल की तरह लिखा जाये तो वह पाठकों के लिये अत्यधिक रुचिकर होता है, लेकिन इसका संक्षिप्त होना बहुत जरूरी है। समाचार चैनलों के सामने खेल प्रस्तुति की बहुत अधिक चुनौतियां नहीं होती। मात्र रोचक प्रस्तुति से ही काम चल जाता है। वहां दृश्य की गुणवत्ता ही दर्शकों के बीच लोकप्रियता तय करती है।
५. विधि समाचार
न्यालाय से जुड़े समाचार भी अपनी अलग अहमियत रखते हैं। नये कानूनों, उनके अनुपालन और उसके प्रभाव से लोगों को परिचित कराना बहुत जरूरी होता है। बहुत से ऐसे लोग होते हैं, जो किसी विशेष मुकदमें की न्यायालयी प्रक्रिया व निर्णय से अवगत होना चाहते हैं। ऐसे मुकदमों की जानकारी देना तो और भी जरूरी होता है, जिनका प्रभाव समाज, सम्प्रदाय, प्रदेश व देश पर पड़ता हो। यही वजह है कि न्याय के हर पक्ष को सही व सार्थक ढंग से रखने के लिये हर समाचार संस्थान में विधि संवाददाताओं की नियुक्ति होती है। इसके लिये विधि की शिक्षा प्राप्त होना जरूरी होता है। कुछ समाचार पत्रों ने अपने यहां कार्यरत अधिवक्ताओं को संवाददाता नियुक्त कर रखा है, जो समय पर विभिन्न न्यायालयों से जुड़ी खबरों को लिखते हैं।
अन्य समाचार
इसी तरह विकास कार्यों से जुड़े विकास समाचार, जन समस्याओं की परत दर परत खोलते समाचार, नये शैक्षिक आयामों व तरह – तरह की शैक्षिक गतिविधियों को प्रस्तुत करते शैक्षिक समाचार, आर्थिक व व्यापार जगत की उठापटक से परिचित कराते समाचार, स्वास्थ्य के हर पहलू से जु़ड़े समाचार, विज्ञान समाचार, पर्यावरण समाचार, मनोरंजन से जुड़े समाचार, फैशन समाचार व सैक्स समाचार भी किसी समाचार पत्र या चैनल के लिये महत्वपूर्ण होते हैं। यहां यह बताते चलें कि सैक्स समाचारों में बलात्कार से जुड़े समाचार नहीं रखे जाते। वास्तव में बड़े – बड़े राष्ट्रीय – अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सैक्स स्केण्डलों व प्रमुख व्यक्तियों की निजी जिंदगी के अनछुए पहलुओं को खास से आम कर देने की ललक ने ही सैक्स समाचारों को समाचारों की फेहरिस्त में शामिल कराया है। सैक्स भ्रांतियों को दूर करने और जनसंख्या नियंत्रण करने के बहाने तरह – तरह के समाचार प्रस्तुत करने का भी दौर आन पड़ा है।
समाचारों की बात हो और खोजी समाचार की बात न हो तो बात अधूरी ही रह जाएगी। सामान्य विवरण से हटकर गहराई के तह तक पहुंचाने वाले समाचार, जिसमें पाठक विभिन्न गलियारों से होता हुआ यह जानकारी जानने की अपनी इच्छा को पूरी करने में सफल हो जाता है कि यह घटना क्यों हुई, कैसे हुई और किन – किन लोगों की भागीदारी से हुई। सच यह है कि आज का साधारण सा साधारण आदमी बढते सूचना साधनों से न केवल सीधे जुड़ा हुआ है, बल्कि वह अधिक तार्किक बुद्धि वाला भी है। वह किसी समाचार को ही पढना, सुनना या देखना भर नहीं चाहता, बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में तमाम तर्कों के साथ उतर जाना चाहता है। लोगों की इस भूख को खोजी पत्रकारिता द्वारा ही मिटाया जा सकता है।
वास्तव में खोजी पत्रकारिता का सीधा सम्बंध जानने के अधिकार से है। भारत में अभी सूचना के अधिकार प्राप्त कर पाने की बात बहुत निचले पायदान पर पड़ी हुई है। यही वजह है कि खोजी पत्रकारिता को जिस हद तक सफल होना चाहिए था, नहीं हो पा रही है। बहरहाल स्थिति उतनी खराब नहीं है। कई समाचार चैनलों ने अपने छिपे कैमरों के जरिये व कई समाचार पत्रों ने दिन व रात की छापेमारी के जरिये खोजी पत्रकारिता को नया आयाम देने की कोशिश की है और लोकप्रियता हासिल की है।
ग. घटना के महत्व के आधार पर
१. विशिष्ट समाचार
वे समाचार जिनके बारे में पहले से कुछ भी मालूम न हो, परंतु जब वे अकस्मात घटित हों तो उनका विशेष महत्व और प्रभाव होता हो, विशिष्ट समाचार कहलाते हैं। विशिष्ट समाचार अपनी विशिष्टता, विशेषता और खूबी के कारण ही समाचार पत्र के मख्य पृष्ठ पर स्थान पाने योग्य होते हैं। रेल या विमान की बड़ी दुर्घटना, किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के असामयिक निधन संबंधी समाचार इसी कोटि में आते हैं।
२. व्यापी समाचार
वे समाचार जिनका प्रभाव विस्तृत हो अर्थात जो बहुसंख्यक लोगों को प्रभावित करने वाले तथा आकार में भी विस्तृत हों, व्यापी समाचार कहलाते हैं। ये समाचार अपने आप में पूर्ण होते हैं और समाचार पत्र के प्रथम पृष्ठ पर छाये रहते हैं। इनके शीर्षक अत्यधिक आकर्षक और विशेष रूप से सुशोभित होते हैं, ताकि ये अधिकाधिक लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर सकें। इसके अंतर्गत रेल बजट, वित्तीय बजट, आम चुनाव आदि से संबंधित समाचार आते हैं।
घ. अपेक्षितता-अनपेक्षितता के आधार पर
१. डायरी समाचार
विविध समारोहों, गोष्ठियों, जन-सभाओं, विधान-सभाओं, विधान परिषदों, लोकसभाओं, राज्य सभाओं आदि के समाचार जो अपेक्षित होते हैं और सुनियोजित ढंग से प्राप्त होते हैं, डायरी समाचार कहलाते हैं।
२. सनसनीखेज समाचार
हत्या, दुर्घटना, प्राकृतिक विपदा, राजनीतिक अव्यवस्था आदि से संबंधित समाचार जो अनपेक्षित होते हैं और आकस्मिक रूप से घट जाते हैं, सनसनीखेज समाचार कहलाते हैं।
ड़. समाचार के महत्व के आधार पर
१. महत्वपूर्ण समाचार
बड़े पैमाने पर दंगा, अपराध, दुर्घटना, प्राकृतिक विपदा, राजनीतिक उठापटक से संबंधित समाचार, जिनसे जन-जीवन प्रभावित होता हो और जिनमें शीघ्रता अपेक्षित हो, महत्वपूर्ण समाचार कहलाते हैं।
२. कम महत्वपूर्ण समाचार
जातीय, सामाजिक, व्यावसायिक एवं राजनीतिक संस्थाओ, संगठनों तथा दलों की बैठकें, सम्मेलन, समारोह, प्रदर्शन, जुलूस, परिवहन तथा मार्ग दुर्घटनाएं आदि से सम्बंधित समाचार, जिनसे सामान्य जनजीवन न प्रभावित होता है और जिनमे अतिशीघ्रता अनपेक्षित हो, कम महत्वपूर्ण समाचार कहलाते हैं।
३. सामान्य महत्व के समाचार
आतंकवादियों व आततायियों के कुकर्म, छेड़छाड़, मारपीट, पाकेटमारी, चोरी, ठगी, डकैती, हत्या, अपहरण, बलात्कार के समाचार, जिनका महत्व सामान्य हो और जिनके अभाव में कोई ज्यादा फर्क न पड़ता हो तथा जो सामान्य जनजीवन को प्रभावित न करते हों, सामान्य महत्व के समाचार कहलाते हैं।
च. सम्पादन के लिये प्रस्तुत समाचार के आधार पर
१. पूर्ण समाचार
वे समाचार जिनके तथ्यों, सूचनाओं, विवरणों आदि में दोबारा किसी परिवर्तन की गुंजाइश न हो, पूर्ण समाचार कहलाते हैं। पूर्ण समाचार होने के कारण ही इन्हें निश्चिंतता के साथ संपादित व प्रकाशित किया जाता है।?
२. अपूर्ण समाचार
वे समाचार जो समाचार एजेंसियों से एक से अधिक हिस्सों में आते हैं और जिनमें जारी अथवा मोरा लिखा होता है, अपूर्ण समाचार कहलाते हैं। जब तक इन समाचारों का अंतिम भाग प्राप्त न हो जाये ये अपूर्ण रहते हैं।
३. अर्ध विकसित समाचार
दुर्घटना, हिंसा या किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति का निधन आदि के समाचार, जो कि जब और जितने प्राप्त होते हैं उतने ही, उसी रूप में ही दे दिये जाते हैं तथा जैसे – जैसे सूचना प्राप्त होती है और समाचार संकलन किया जाता है वैसे – वैसे विकसित रूप में प्रकाशित किये जाते हैं, अर्ध विकसित समाचार कहलाते हैं।
४. परिवर्तनशील समाचार
प्राकृतिक विपदा, आम चुनाव, बड़ी दुर्घटना, किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति की हत्या जैसे समाचार, जिनके तथ्यों, सूचनाओं तथा विवरणों में निरंतर परिवर्तन व संशोधन की गुंजाइश हो, परिवर्तनशील समाचार कहलाते हैं।
५. बड़े अथवा व्यापी समाचार
आम चुनाव, केन्द्र सरकार का बजट, राष्ट्रपति का अभिभाषण जैसे समाचार, जो व्यापाक, असरकारी व प्रभावकारी होते हैं तथा जिनके विवरणों में विस्तार व विविधता होती है और जो लगभग समाचार पत्र के प्रथम पृष्ठ का पूरा ऊपरी भाग घेर लेते हैं, बड़े अथवा व्यापी समाचार कहलाते हैं।
छ. समाचार प्रस्तुत करने के आधार पर
१. सीधे समाचार
वे समाचार जिनमें तथ्यों की व्याख्या नहीं की जाती हो, उनके अर्थ नहीं बताये जाते हों तथा तथ्यों को सरल, स्पष्ट और सही रूप में ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया जाता हो, सीधे समाचार कहलाते हैं।
२. व्याख्यात्मक समाचार
वे समाचार जिनमें घटना के साथ ही साथ पाठकों को घटना के परिवेश, घटना के कारण और उसके विशेष परिणाम की पूरी जानकारी दी जाती हो, व्याख्यात्मक समाचार कहलाते हैं।